सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर ACB जज को फ़साने की कोशिश , सुरेश चंद्रशेखर दोषी करार
ठगी के मामले में पहले से जेल में बंद सुकेश चंद्रशेखर एक बार फिर फंस गया है दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने उसे सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर ACB के स्पेशल जज को प्रभावित करने के मामले में दोषी ठहराया है कोर्ट ने कहा की ये सिर्फ एक फ़ोन कॉल नही था बल्कि पूरी न्यायिक व्यवस्था से खिलवाड़ की सुनियोजित साजिश थी | मामला बेहद गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि आरोप केवल किसी व्यक्ति को धोखा देने का नहीं था। अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या एक आरोपी ने न्यायिक हिरासत में रहते हुए कानून की प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत के जज की पहचान का इस्तेमाल किया।
क्या है पूरा मामला ?
मामला 2026 का ही आरोप है की न्यायिक हिरासत में रहते हुए सुकेश ने जेल में तेनात एक कांस्टेबल मंजीत के फ़ोन तक पहुच बना ली उसी फ़ोन से उसने ACB के उस स्पेशल जज के आफिस वाले लेडलाइन नंबर पर कॉल किया जो उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के केस की सुनवाई कर रहे थे | पहले उसने खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज का सचिव बताया फिर कॉल में उसने कहा की वो खुद सुप्रीम कोर्ट का जज बोल रहा है अभियोजन पक्ष के अनुसार, कॉल करने वाले व्यक्ति ने पहले खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक जज का निजी सचिव बताया। इसके बाद कथित तौर पर एक अन्य व्यक्ति या उसी कॉल के क्रम में जज होने का दावा किया गया और न्यायिक अधिकारी को सुकेश को जमानत देने के लिए प्रभावित करने की कोशिश की गई।अदालत के अनुसार, यह मामला किसी सामान्य या आकस्मिक गलत बयान का नहीं था। आरोप यह था कि एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट के जज की पहचान अपनाई और उस पहचान के आधार पर एक न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश की। कोर्ट ने माना कि न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था इस भरोसे पर टिकी है कि मामलों का फैसला कानून और सबूतों के आधार पर होगा, न कि निजी फोन कॉल, दबाव, धमकी या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की कथित सिफारिश पर।
क्या चाहता था सुकेश ?
कोर्ट के मुताबिक सुकेश का मकसद साफ था – ACB जज पर जवाब बनाकर जमानत दिलवाना और केस के नतीजे को अपने पक्ष में मोड़ना था | उसने जज को प्रभावित करने के लिए झूठी पहचान का इस्तेमाल किया और न्यायिक प्रक्रिया में दखल देने की कोशिश की | जिस समय कथित फोन कॉल किया गया, उस दौरान उसके खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ा मामला लंबित था और जमानत का मुद्दा भी महत्वपूर्ण था।अदालत ने इस पूरे मामले को केवल गलत पहचान बताने की घटना नहीं माना। कोर्ट के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति किसी न्यायिक अधिकारी को उसके लंबित मामले के संबंध में प्रभावित करने के लिए झूठी पहचान और कथित संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो यह सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप की कोशिश हो सकती है।इसका उद्देश्य केवल किसी को भ्रमित करना नहीं, बल्कि एक न्यायिक निर्णय को प्रभावित करना था।
कोर्ट ने क्या कहा ?
तीस हजारी कोर्ट ने सुकेश को IPC की धारा 170 , 189 और 507 के तहत दोषी माना जज का कहना है की ये महज गलत पहचान बताना या एक फ़ोन करना नही है ये न्यायिपलिका के नाम और भरोसे को हडपने की कोशिश थी जज बनकर बात करना सीधे सीधे न्यायिक संस्था की साख पर हमला है कोर्ट ने कहा की पुलिस के सबूत एक दुसरे से जुड़ते है और ये साबित करते है की सुकेश ने जानबोझाकर ये साजिश रची है |कोर्ट ने माना कि न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था इस भरोसे पर टिकी है कि मामलों का फैसला कानून और सबूतों के आधार पर होगा, न कि निजी फोन कॉल, दबाव, धमकी या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की कथित सिफारिश पर।
जेल प्रशासन पे भी उठे सवाल
सबसे हैरान करने वाली बात ये है की एक हाई-सिक्योरिटी जेल में बंद कैदी के पास कांस्टेबल का फोन कैसे पंहुचा ? कोर्ट ने इसी पर नाराजगी जताई जज ने कहा की अगर जेल में ही सुरक्षा इतनी ढीली है तो बाहर के मामलो पर क्या ही भरोसा किया जाए इसी वजह से कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को जाँच के आदेश दिए | कोर्ट ने माना कि न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था इस भरोसे पर टिकी है कि मामलों का फैसला कानून और सबूतों के आधार पर होगा, न कि निजी फोन कॉल, दबाव, धमकी या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की कथित सिफारिश पर।
कांस्टेबल मनजीत पर भी जाँच के आदेश
इस पुरे खेल में सबसे बड़ा सवाल ये है की जेल के अन्दर बंद सुकेश को कांस्टेबल का फ़ोन कैसे मिल गया इसीलिए कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया की वो कांस्टेबल मनजीत की भूमिका की दोबारा जाँच करे पता लगाया जाये की सुरेश तक फ़ोन कैसे पंहुचा और इस साजिश में मनजीत की कितनी भागीदारी थी और तो और जेल में सुरक्षा में कहा चुक हो गई | यह भी जांच का विषय हो सकता है कि फोन का इस्तेमाल कितनी देर तक हुआ और कॉल के समय कौन-कौन मौजूद था।कोर्ट के आदेश के बाद इस बात की भी जांच होगी कि क्या फोन से संबंधित कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य पहले की जांच में छूट गए थे और क्या कांस्टेबल के खिलाफ विभागीय या आपराधिक कार्रवाई की आवश्यकता है।
इस मामले में आगे क्या होगा ?
सजा का ऐलान बाद में होगा लेकिन दोषी करार दिए जाने के बाद सुकेश की मुश्किलें और बढ़ गई है क़ानूनी एक्सर्टस का कहना है की न्यायिक अधिकारी बनकर धोखा देना बहुत गंभीर अपराध है | इसमे 3 से 7 साल तक की सजा हो सकती है साथ ही जेल प्रशासन के खिलाफ भी एक्सन हो सकता है | इसमे लंबी सजा हो सकती है |जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि सुकेश तक मोबाइल फोन पहुंचने की परिस्थितियां क्या थीं।अगर जांच में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है, तो उस आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
अंत में
एक ठग ने जेल के अंदर से ही बैठकर सुप्रीम कोर्ट का जज बनने की हिम्मत की | मकसद था केस को प्रभावित करना | लेकिन कोर्ट ने साफ कर दिया की न्यायिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नही होगा | अब सबकी नजर इस बात पर है की कांस्टेबल मनजीत की जाँच में क्या निकलता है और जेल की सुरक्षा कैसे सुधारी जाती है |तीस हजारी कोर्ट ने सुकेश चंद्रशेखर को दोषी ठहराते हुए साफ कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया को झूठी पहचान, निजी फोन कॉल, दबाव या कथित प्रभाव के जरिए प्रभावित करने की कोशिश को सामान्य अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है—एक आरोपी तक हिरासत के दौरान पुलिस अधिकारी का मोबाइल फोन आखिर कैसे पहुंचा और क्या यह केवल सुरक्षा में लापरवाही थी या इसके पीछे किसी तरह की मिलीभगत भी थी?