सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था मामला, असहमति का नोट दबाया गया तो लवासा ने छोड़ दी कुर्सी, चुनाव आयोग में CEC और आयुक्तों का टकराव
नई दिल्ली चुनाव आयोग को लोकतंत्र का सबसे भरोसेमंद स्तंभ माना जाता है। लेकिन इस भरोसेमंद संस्था के अंदर भी कई बार ऐसी दरारें पड़ी हैं कि पूरी दुनिया ने देखा। मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC और बाकी चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद, अधिकारों की लड़ाई और एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश। ये सिलसिला कोई नया नहीं है। इसकी शुरुआत 1989 से मानी जाती है और तब से लेकर आज तक आयोग के भीतर कई बार घमासान मचा है। टीएन शेषन का दौर हो या अशोक लवासा का, हर बार आयोग के भीतर की लड़ाई बाहर आकर सुर्खियां बनी।
1989 से पहले चुनाव आयोग एक सदस्यीय संस्था थी। सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त होता था और सारे फैसले उसी के हाथ में होते थे। लेकिन 1989 में राजीव गांधी सरकार ने पहली बार आयोग को बहुसदस्यीय बनाने का फैसला किया। अक्टूबर 1989 में एसएस धनाओ और वीएस सीगल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। उस समय आरवीएस पेरी शास्त्री मुख्य चुनाव आयुक्त थे। शास्त्री ने सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा लेकिन उनके करीबी लोगों ने बताया कि उन्हें लगा कि सरकार ने जानबूझकर उनकी शक्तियां कम करने के लिए दो नए आयुक्त लाए हैं। शास्त्री को लगा कि अब हर फैसला तीन लोगों की सहमति से होगा और उनकी मोनोपॉली खत्म हो जाएगी। लेकिन ये प्रयोग ज्यादा दिन नहीं चला। जनवरी 1990 तक आते-आते सरकार बदल गई और वीपी सिंह की सरकार ने दोनों नए आयुक्तों की नियुक्ति रद्द कर दी। आयोग फिर से एक सदस्यीय हो गया। ये पहला मौका था जब आयोग के भीतर अधिकारों को लेकर तनाव आया लेकिन वो बाहर नहीं दिखा।
असली घमासान शुरू हुआ 1993 में। वीपी सिंह के बाद चंद्रशेखर और फिर नरसिम्हा राव की सरकार आई। 1993 में नरसिम्हा राव सरकार ने फिर से चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाया। इस बार टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। शेषन उस समय देश के सबसे ताकतवर और सबसे विवादित CEC माने जाते थे। उन्होंने चुनाव सुधार के नाम पर ऐसी सख्ती की कि राजनेताओं से लेकर अधिकारियों तक सब कांप गए। मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य किया, आदर्श आचार संहिता को सख्ती से लागू किया, शराब और पैसे बांटने पर रोक लगाई। शेषन का नाम सुनते ही लोग सीधे हो जाते थे।
इसी दौर में सरकार ने एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया। शेषन को ये बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। वो मानते थे कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता का मतलब है कि CEC ही सर्वोपरि है। दो और आयुक्तों की नियुक्ति को उन्होंने अपने अधिकारों पर हमला माना। इसके बाद जो हुआ वो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अनोखा है। शेषन ने दोनों नए आयुक्तों को मान्यता देने से इनकार कर दिया। वो उनके साथ बैठते ही नहीं थे। आधिकारिक फाइलें उन तक नहीं भेजी जाती थीं। आयोग की महत्वपूर्ण बैठकों में उन्हें बुलाया ही नहीं जाता था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में शेषन अकेले आते और कहते कि आयोग का फैसला यही है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक शेषन ने एक इंटरव्यू में गिल और कृष्णमूर्ति का मजाक उड़ाते हुए उन्हें अपने कार्यालय के “दो गधे” तक कह दिया था। उनका कहना था कि ये दोनों बिना काम के तनख्वाह ले रहे हैं। गिल और कृष्णमूर्ति ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी, सुप्रीम कोर्ट गए। मामला इतना बढ़ गया कि सरकार को बीच-बचाव करना पड़ा। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आयोग के फैसले बहुमत से होंगे। CEC अकेला तानाशाह नहीं बन सकता। इस फैसले के बाद शेषन को झुकना पड़ा लेकिन उनके और दोनों आयुक्तों के बीच तनाव जीवन भर रहा। शेषन के बाद भी आयोग में मतभेद की खबरें आती रहीं लेकिन वो इतनी सार्वजनिक नहीं हुईं। 2009 में नवीन चावला जब CEC बने तो उनके और चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी के बीच मतभेद सामने आए। गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर कहा कि चावला निष्पक्ष नहीं हैं और उन्हें हटाया जाए। ये चिट्ठी लीक हो गई और पूरे देश में हंगामा मच गया। आखिरकार चावला अपना कार्यकाल पूरा करके गए।
2018 में एक और बड़ा विवाद हुआ। अशोक लवासा उस समय चुनाव आयुक्त थे। लोकसभा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के कई मामले आए। आयोग की बैठक में तीन में से दो सदस्य यानी CEC सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने बीजेपी नेताओं को क्लीन चिट दे दी। लवासा ने असहमति जताई और कहा कि उनका नोट भी आदेश में शामिल किया जाए। लेकिन उनका नोट शामिल नहीं किया गया। लवासा ने फिर आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मतभेद वाली बैठकों का रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा। इसके बाद लवासा को कई अहम बैठकों में नहीं बुलाया गया। मामला इतना बढ़ा कि लवासा ने इस्तीफा दे दिया और एशियाई विकास बैंक चले गए। उन्होंने कहा कि वो लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़ रहे थे।
2024 में फिर से विवाद हुआ जब अरुण गोयल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। विपक्ष ने सवाल उठाया कि एक रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट को रातों-रात कैसे नियुक्त कर दिया गया। हालांकि गोयल ने बाद में इस्तीफा दे दिया।
अब 2025 में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। उनके साथ दो नए चुनाव आयुक्त भी हैं। आयोग ने पारदर्शिता के लिए कहा है कि अब सभी फैसले बहुमत से होंगे और असहमति का नोट भी सार्वजनिक किया जाएगा। लेकिन अंदर क्या चल रहा है ये कोई नहीं जानता। इन सभी घटनाओं से एक बात साफ है। जब भी आयोग बहुसदस्यीय बना है, सत्ता का संतुलन बिगड़ा है। CEC हमेशा चाहता है कि आखिरी फैसला उसी का हो। नए आयुक्त चाहते हैं कि उनकी भी सुनी जाए। सरकार चाहती है कि आयोग उसके हिसाब से चले। इसी त्रिकोण में आयोग फंस जाता है। चुनाव आयोग की साख इसी बात पर है कि वो निष्पक्ष है। लेकिन जब आयोग के अंदर ही लड़ाई सार्वजनिक हो जाती है तो जनता का भरोसा डगमगाता है। शेषन ने भले ही “गधे” शब्द इस्तेमाल किया हो लेकिन उन्होंने आयोग को मजबूत भी किया। लवासा ने इस्तीफा देकर सवाल भी उठाए और सिस्टम को झकझोरा भी।
आज जरूरत इस बात की है कि आयोग के अंदर की कार्यप्रणाली साफ हो। हर बैठक का रिकॉर्ड बने। हर असहमति सार्वजनिक हो। ताकि पता चले कि फैसला कैसे हुआ। वरना 1989 से शुरू हुआ ये घमासान आगे भी चलता रहेगा। चुनाव आयोग लोकतंत्र की रीढ़ है। अगर रीढ़ में ही दर्द होगा तो लोकतंत्र कैसे सीधा खड़ा रहेगा।