“सुप्रीम कोर्ट ने रोका ‘समान वेतन’ का रास्ता, कहा- हर मांग पर कोर्ट पहुंचे तो सरकारी खजाने पर पड़ेगा बोझ”
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने “समान काम के लिए समान वेतन” के सिद्धांत को लेकर साफ किया कि हर सरकारी कर्मचारी इसे अपना मौलिक अधिकार मानकर सीधे अदालत से समान वेतन की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट के मुताबिक, संविधान में समान काम के लिए समान वेतन का विचार अनुच्छेद 39(d) के तहत राज्य के लिए एक नीति-निर्देशक सिद्धांत के रूप में मौजूद है। यानी सरकार को इस दिशा में काम करने की अपेक्षा है, लेकिन यह ऐसा मौलिक अधिकार नहीं है जिसे हर मामले में अदालत सीधे लागू कर दे। कोर्ट ने यह भी माना कि केवल काम का नाम या पद समान होना ही पर्याप्त नहीं है। वेतन तय करते समय जिम्मेदारियां, योग्यता, भर्ती की प्रक्रिया, काम की प्रकृति, अनुभव, सेवा की शर्तें और पद की जिम्मेदारी जैसे कई पहलुओं को देखा जा सकता है। इसलिए दो कर्मचारियों का काम ऊपर से एक जैसा दिखाई देने के बावजूद उनकी वेतन-व्यवस्था अलग हो सकती है।फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वेतन और सेवा शर्तों से जुड़े नीतिगत फैसले मुख्य रूप से सरकार और संबंधित विभाग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अदालत का काम हर सरकारी पद के लिए वेतनमान तय करना नहीं है। अगर किसी कर्मचारी के साथ कानून के खिलाफ भेदभाव हुआ हो या समान परिस्थितियों में मनमाना अंतर किया गया हो, तो उस मामले में न्यायिक समीक्षा का रास्ता खुला रहता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि “समान काम-समान वेतन” का सिद्धांत पूरी तरह खत्म हो गया। बल्कि इसका अर्थ यह है कि सिर्फ इस सिद्धांत का हवाला देकर समान वेतन पाने का दावा अपने आप स्वीकार नहीं किया जा सकता। कर्मचारी को यह दिखाना होगा कि जिन कर्मचारियों से उसकी तुलना की जा रही है, उनके काम, जिम्मेदारी, योग्यता और सेवा की परिस्थितियां वास्तव में समान हैं और फिर भी वेतन में अंतर किया गया है।
पूरा मामला क्या था? आरडी शर्मा केस की कहानी
ये मामला मध्य प्रदेश राज्य बनाम आरडी शर्मा का है। आरडी शर्मा मध्य प्रदेश में प्रधान मुख्य वन संरक्षक यानी PCCF के पद से रिटायर हुए थे। रिटायरमेंट के बाद उनकी पेंशन 37,750 रुपये तय की गई। ये 2008 से पहले वाले HAG स्केल 75,000-80,000 का 50% था। 2008 में केंद्र सरकार ने नया नियम लाया – भारतीय वन सेवा वेतन द्वितीय संशोधन नियम 2008। इसके तहत PCCF का नया वेतनमान 80,000 रुपये फिक्स हो गया। तो पेंशन भी 50% यानी 40,000 रुपये होनी चाहिए थी। शर्मा ने सरकार से मांग की कि उनकी पेंशन भी 40,000 की जाए। सरकार ने मना कर दिया। शर्मा हाईकोर्ट गए। दिल्ली हाईकोर्ट ने शर्मा के पक्ष में फैसला दे दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि “समान काम के लिए समान वेतन” के सिद्धांत के तहत शर्मा को भी 40,000 पेंशन मिलनी चाहिए। हाईकोर्ट ने 2017 के पंजाब बनाम जगजीत सिंह वाले केस का हवाला दिया। इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया और सरकार की अपील मान ली। कोर्ट ने 5 बहुत जरूरी बातें कहीं:
- “समान काम-समान वेतन” मौलिक अधिकार नहीं है
बेंच ने साफ कहा – “हरियाणा राज्य बनाम हरियाणा सिविल सचिवालय पर्सनल स्टाफ एसोसिएशन 2002 के केस में हम पहले ही कह चुके हैं कि समान काम के लिए समान वेतन मौलिक अधिकार नहीं है। ये सिर्फ सरकार का संवैधानिक लक्ष्य है।”
मतलब आप इसे लेकर सीधे कोर्ट नहीं जा सकते कि मेरा काम फलां के जैसा है तो सैलरी भी उतनी दो। - वेतन तय करना सरकार का काम है, कोर्ट का नहीं
कोर्ट ने कहा – “किस पद को किस वेतनमान में रखना है, ये तय करना कार्यपालिका का काम है। ये नौकरी का मूल्यांकन है। इसमें बहुत सारा डेटा, जिम्मेदारी, वित्तीय असर देखा जाता है। ये काम वेतन आयोग जैसे विशेषज्ञ करते हैं।”
कोर्ट ने कहा हम जज हैं, अकाउंटेंट नहीं। हम हर नौकरी का मूल्यांकन नहीं कर सकते। - हाईकोर्ट ने गलत केस का हवाला दिया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने जगजीत सिंह वाले केस को गलत समझा। वो केस संविदा कर्मचारियों का था, जहां काम बिल्कुल एक जैसा था। लेकिन यहां PCCF के वेतनमान में 2008 में बदलाव हुआ था और रिटायरमेंट पहले का था। दोनों केस अलग हैं। - हस्तक्षेप तभी जब साफ गलती हो
कोर्ट ने कहा – “जब तक रिकॉर्ड पर ये साबित न हो जाए कि वेतन तय करने में बहुत बड़ी गलती हुई है और अन्याय हो रहा है, तब तक कोर्ट दखल नहीं देगा।”
इस केस में ऐसी कोई गलती साबित नहीं हुई। - ट्रिब्यूनल सही था, हाईकोर्ट गलत
कोर्ट ने कहा कि पहले सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल ने शर्मा का दावा खारिज किया था, वो सही था। हाईकोर्ट का दखल देना गलत था।
कानूनी एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं?
इस फैसले को लेकर कानूनी जानकारों की राय दो अलग-अलग पहलुओं पर है। एक पक्ष का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से सरकारों और सरकारी विभागों को बड़ी राहत मिलेगी। अगर हर कर्मचारी केवल काम की समानता के आधार पर दूसरे पद के बराबर वेतन की मांग लेकर अदालत पहुंचने लगे, तो वेतनमान तय करने से जुड़े मामलों की संख्या लगातार बढ़ सकती है। इससे सरकारों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने के साथ-साथ अदालतों में भी ऐसे मामलों की संख्या बढ़ने की आशंका रहती है।कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, वेतन तय करना सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि दो कर्मचारी एक जैसा काम कर रहे हैं या नहीं। उनकी शैक्षणिक योग्यता, भर्ती प्रक्रिया, जिम्मेदारी, अनुभव, सेवा की शर्तें और पद की प्रकृति जैसे कई पहलू भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए अदालत हर मामले में सीधे समान वेतन का आदेश दे, यह जरूरी नहीं है।
दूसरा पक्ष संविदा और अस्थायी कर्मचारियों को लेकर चिंता जताता है। देश के कई विभागों में ऐसे कर्मचारी लंबे समय से नियमित कर्मचारियों के समान या मिलते-जुलते काम करते हैं, लेकिन उनकी सेवा शर्तें और वेतन अलग होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कर्मचारियों के लिए यह साबित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है कि वे वास्तव में नियमित कर्मचारियों के बराबर जिम्मेदारी, योग्यता और काम की शर्तों में काम कर रहे हैं।इसका यह मतलब नहीं है कि संविदा कर्मचारियों के लिए अदालत का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है। हर मामले के तथ्य अलग होते हैं, और यदि किसी कर्मचारी के साथ कानून के खिलाफ भेदभाव या मनमाना व्यवहार हुआ है, तो न्यायिक राहत की संभावना बनी रहती है। इसलिए इस फैसले का असर समझने के लिए कर्मचारी की नियुक्ति, काम की प्रकृति और सेवा की शर्तों को अलग-अलग देखना जरूरी होगा।