“क्या आपको लगता है महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?”: SC ने IOC को लगाई फटकार, दिलाया ₹12 लाख मुआवजा
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को एक कड़ी फटकार लगाते हुए कहा – “क्या आपको लगता है महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?”कोर्ट ने जेंडर के आधार पर एक महिला को नौकरी से वंचित करने के मामले में IOC को ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया है। बेंच ने कहा कि महिला अब रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी है, इसलिए उसे नौकरी देने की बजाय मुआवजा देना ही न्याय है।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने ये फैसला सुनाते हुए IOC के अधिकारियों की सोच पर भी सवाल उठाए।इस मामले की पृष्ठभूमि करीब 38 साल पुरानी है। 1988 में हरियाणा के करनाल में इंडियन ऑयल के LPG बॉटलिंग प्लांट में एक महिला ने कजुअल खलासी/प्यून/रीफिलिंग हेल्पर के पद के लिए आवेदन किया था। स्थानीय समिति ने रोजगार के लिए 49 लोगों की सिफारिश की थी, जिनमें वह महिला भी शामिल थीं। बाद में 43 उम्मीदवारों को नियुक्ति मिल गई, लेकिन महिला को नौकरी नहीं दी गई।
सुप्रीम कोर्ट में IOC की ओर से यह दलील सामने आई कि रीफिलिंग हेल्पर का काम शारीरिक मेहनत वाला था, जिसमें LPG सिलेंडर उठाने के साथ-साथ नाइट शिफ्ट भी शामिल हो सकती थी। इसी संदर्भ में बेंच ने सवाल उठाया कि क्या सिर्फ महिला होने के आधार पर यह मान लेना सही है कि वह सिलेंडर नहीं उठा सकती। कोर्ट ने ऐसी सोच को महिला की गरिमा और समान अवसर के खिलाफ बताया।कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि इतने लंबे समय बाद महिला अब रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी हैं, इसलिए इस समय नौकरी देना व्यावहारिक नहीं होगा। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी के बदले ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया।इस फैसले का मुख्य मुद्दा सिर्फ LPG सिलेंडर उठाने का नहीं, बल्कि नौकरी में जेंडर के आधार पर भेदभाव और समान अवसर का है। खास तौर पर इसलिए भी मामला महत्वपूर्ण है क्योंकि संबंधित संस्था एक सरकारी उपक्रम है और कोर्ट ने उससे महिलाओं के साथ समान व्यवहार की अपेक्षा पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में IOC की दलील और SC की फटकार
सुप्रीम कोर्ट में IOC के वकील ने दलील दी – “रिफिलिंग हेल्पर का काम बहुत मेहनत का है। इसमें 14 किलो से 19 किलो के LPG सिलेंडर उठाने पड़ते हैं। साथ में रात की शिफ्ट भी करनी होती है। इसलिए अधिकारियों ने महिला को उपयुक्त नहीं माना।”
इतना सुनते ही जस्टिस अरविंद कुमार भड़क गए। उन्होंने IOC के वकील से सीधा पूछा:
सुप्रीम कोर्ट में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) की ओर से दलील दी गई कि जिस पद के लिए महिला ने आवेदन किया था, उसमें रिफिलिंग हेल्पर का काम शारीरिक रूप से मेहनत वाला था। वकील ने बताया कि इस काम में LPG सिलेंडर उठाने-रखने के साथ-साथ प्लांट में अलग-अलग शिफ्टों, जिसमें रात की शिफ्ट भी शामिल हो सकती है, में काम करना पड़ता था। इसी आधार पर उस समय अधिकारियों ने महिला को इस पद के लिए उपयुक्त नहीं माना था| लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर कड़ी आपत्ति जताई। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने सवाल उठाया कि क्या केवल महिला होने के कारण यह पहले से मान लिया जा सकता है कि वह ऐसा शारीरिक काम नहीं कर सकती? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की क्षमता का फैसला उसके जेंडर के आधार पर नहीं किया जा सकता। अगर नौकरी में शारीरिक मेहनत जरूरी है,
कोर्ट ने मामले को अनुच्छेद 14 और 16 के संदर्भ में भी देखा। अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता की बात करता है, जबकि अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार में समान अवसर से संबंधित है। हालांकि यह विवाद कई दशक पुराना है, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में महिला के साथ हुए कथित भेदभाव को गंभीरता से लिया और इसी वजह से अंततः नौकरी देने के बजाय ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया, क्योंकि अब वह सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुकी हैं।बेंच ने इस सोच पर भी सवाल उठाया कि महिलाओं को घरेलू कामों या शारीरिक मेहनत के काम से जोड़कर उनकी क्षमता को कमतर क्यों माना जाए। कोर्ट का जोर इस बात पर था कि महिला और पुरुष दोनों को रोजगार के समान अवसर मिलने चाहिए और सिर्फ लिंग के आधार पर किसी उम्मीदवार को बाहर करना संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
कानूनी एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं?
वरिष्ठ वकीलों के मुताबिक, मामले में अदालत ने रोजगार में जेंडर के आधार पर बनाई गई धारणा पर सवाल उठाया है। यानी किसी काम को केवल इसलिए पुरुषों के लिए उपयुक्त मान लेना कि उसमें शारीरिक मेहनत ज्यादा है, अपने-आप में पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।उम्मीदवार पद के लिए निर्धारित योग्यता और वास्तविक कार्य-आवश्यकताओं को पूरा करता है या नहीं। यदि कोई महिला आवश्यक मानकों को पूरा करती है, तो सिर्फ महिला होने के आधार पर उसे अवसर से बाहर करना समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांतों के सवाल खड़े कर सकता है।, महिला अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने फैसले में दिए गए ₹12 लाख के मुआवजे को महत्वपूर्ण माना है।
आम महिलाओं के लिए इसका मतलब क्या है?
इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सिर्फ महिला होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को नौकरी के लिए अयोग्य नहीं माना जा सकता। अगर किसी पद के लिए निर्धारित योग्यता और काम की शर्तें महिला पूरी करती है, तो केवल यह सोचकर उसे अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता कि काम में शारीरिक मेहनत ज्यादा है या उसमें रात की शिफ्ट करनी पड़ सकती है।मसलन, अगर किसी फैक्ट्री, सरकारी विभाग या दूसरी संस्था में किसी पद पर भारी सामान उठाने, मशीन चलाने या शिफ्ट में काम करने की जरूरत है, तो नियोक्ता को काम की वास्तविक जरूरतों के आधार पर योग्यता तय करनी होगी, न कि यह मान लेना होगा कि महिलाएं ऐसा काम नहीं कर सकतीं।इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर महिला को हर तरह की नौकरी स्वतः मिल जाएगी। आवश्यक योग्यता, सुरक्षा मानक और पद की वास्तविक शर्तें सभी उम्मीदवारों पर समान रूप से लागू होंगी। फर्क सिर्फ इतना है कि महिला होने को अपने-आप में अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में खास बात यह रही कि विवाद 1988 की नियुक्ति से जुड़ा था और मामला कई दशकों तक अदालतों में चला। अब महिला की उम्र सेवानिवृत्ति से अधिक हो चुकी है, इसलिए कोर्ट ने नौकरी देने के बजाय ₹12 लाख का मुआवजा देने का रास्ता चुना। इसलिए आम महिलाओं के लिए संदेश है कि सरकारी नौकरी या किसी संस्थान में आवेदन करते समय सिर्फ जेंडर के आधार पर अवसर रोकना चुनौती देने योग्य हो सकता है। हालांकि हर मामले के तथ्य अलग होंगे और अदालत का अंतिम फैसला संबंधित नियमों, योग्यता और उपलब्ध सबूतों पर निर्भर करेगा।