“खतरे में TMC का ‘जोड़ा फूल’! उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग फ्रीज कर सकता है नाम और निशान”
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के घर में बंटवारा हो गया है और अब ये लड़ाई चुनाव आयोग तक पहुंच गई है। मामला सिर्फ कुर्सी का नहीं है, मामला है पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न का। 6 अक्टूबर 2026 को नंदीग्राम और रेजीनगर में विधानसभा उपचुनाव होने हैं। लेकिन उससे पहले ही TMC के दो गुट आमने-सामने आ गए हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का गुट है, दूसरी तरफ रितब्रत बनर्जी का गुट। दोनों ही “तृणमूल कांग्रेस” के नाम और “जोड़ा फूल” के निशान पर दावा कर रहे हैं। अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है। आयोग ने बुधवार को दोनों पक्षों से दोपहर 3 बजे तक अतिरिक्त दस्तावेज मांगे थे और आज गुरुवार को फिर सुनवाई हो सकती है। 19 सितंबर तक चुनाव चिह्न फाइनल करना जरूरी है वरना उपचुनाव में दोनों गुट नए नाम और नए निशान से लड़ेंगे। असली विवाद क्या है? पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC के भीतर दो गुट आमने-सामने हैं। एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट है, जबकि दूसरी तरफ रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट पार्टी पर अपना दावा कर रहा है। दोनों पक्ष खुद को असली TMC बताते हुए पार्टी के संगठन, नाम और चुनाव चिह्न पर अधिकार जता रहे हैं। चुनाव आयोग के सामने दोनों गुटों ने अपने-अपने दस्तावेज और दावे भी पेश किए हैं।
कैसे शुरू हुआ झगड़ा, अंदर की कहानी
ये लड़ाई एक दिन में नहीं शुरू हुई। इसकी जड़ें 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से हैं। 2024 में TMC ने बंगाल में 29 सीटें जीती थीं। लेकिन हार का अंतर कम था और कई सीटों पर संगठन को लेकर सवाल उठे। उसी समय रितब्रत बनर्जी ने सार्वजनिक तौर पर कहा था “पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र खत्म हो गया है। फैसले सिर्फ एक घर से होते हैं।” रितब्रत बनर्जी पहले TMC के युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। ममता बनर्जी के करीबी माने जाते थे। लेकिन पिछले 2 साल में उनकी दूरी बढ़ती गई। जुलाई 2026 में पंचायत चुनाव के दौरान रितब्रत गुट ने कई जगहों पर अलग उम्मीदवार खड़े कर दिए। ममता गुट ने इसे “अनुशासनहीनता” कहा और 12 नेताओं को निष्कासित कर दिया। बस यहीं से बंटवारा पक्का हो गया। 15 अगस्त 2026 को रितब्रत ने कोलकाता में रैली की और कहा “हम असली तृणमूल हैं। जोड़ा फूल हमारा है।” ममता गुट ने तुरंत पलटवार किया। कहा “पार्टी हमारी है, निशान हमारा है। ये लोग BJP के एजेंट हैं।”
चुनाव आयोग में क्या हुआ, 19 सितंबर की डेडलाइन
बात जब नहीं बनी तो दोनों गुट चुनाव आयोग पहुंच गए। 10 सितंबर को दोनों ने अलग-अलग अर्जी दी।
ममता गुट का दावा: हमारे पास 7 में से 5 सांसद, 213 में से 198 विधायक, 80% जिला अध्यक्ष और 90% ब्लॉक अध्यक्ष हैं। 1998 से पार्टी रजिस्टर्ड है। जोड़ा फूल का निशान 1998 से लगातार इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए असली TMC हम हैं।
रितब्रत गुट का दावा: ममता दीदी ने पार्टी को परिवार बना दिया। संविधान के अनुसार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक नहीं हुई। हम 40% पदाधिकारी हैं और जनाधार हमारे साथ है। इसलिए पार्टी और निशान पर हमारा भी बराबर का हक है।
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को सुना। आयोग के नियम कहते हैं कि अगर किसी मान्यता प्राप्त पार्टी में बंटवारा होता है तो आयोग देखता है कि किस गुट के पास विधायक, सांसद और संगठन का बहुमत है। जिसे बहुमत मिलता है उसे नाम और निशान मिलता है। दूसरे गुट को नया नाम और नया निशान लेना पड़ता है। बुधवार को आयोग ने दोनों से कहा “आज दोपहर 3 बजे तक संगठन का पूरा ब्यौरा, बैंक खाते, सदस्यता सूची और हलफनामा जमा करो।” आज गुरुवार को फिर सुनवाई है। आयोग के सूत्रों का कहना है कि अगर आज फैसला नहीं हुआ तो 19 सितंबर तक अंतरिम आदेश देना पड़ेगा। क्योंकि 20 सितंबर से नंदीग्राम और रेजीनगर के लिए नामांकन शुरू हो रहा है।
नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव क्यों हैं अहम
6 अक्टूबर को 2 सीटों पर वोटिंग है।
नंदीग्राम: 2021 में ममता बनर्जी खुद यहां से हारी थीं। फिर 2026 में विधायक ने इस्तीफा दे दिया। ये सीट TMC के लिए प्रतिष्ठा की है।
रेजीनगर: मुर्शिदाबाद की सीट। यहां अल्पसंख्यक वोटर ज्यादा हैं। TMC का गढ़ माना जाता है।
अगर “जोड़ा फूल” फ्रीज हो गया तो दोनों गुटों को नए निशान से लड़ना पड़ेगा। वोटर कंफ्यूज होगा। BJP और CPM को फायदा मिल सकता है। इसीलिए दोनों गुटों के लिए ये उपचुनाव करो या मरो की लड़ाई है।
“जोड़ा फूल” का मतलब और इमोशन
बंगाल में “जोड़ा फूल” सिर्फ चुनाव चिह्न नहीं है। ये इमोशन है। 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर TMC बनाई थी तब “जोड़ा फूल” चुना गया था। मतलब दो फूल एक साथ। ममता कहती थीं “ये मां-माटी-मानुष का प्रतीक है।” पिछले 28 साल में इसी निशान पर TMC ने 3 बार सरकार बनाई। 2011 में 34 साल के वाम शासन को खत्म किया। अब अगर यही निशान चला गया तो कार्यकर्ता टूट जाएंगे। एक TMC नेता ने कहा “कार्यकर्ता को नाम याद नहीं रहता, निशान याद रहता है। अगर फूल गया तो 50% वोट चला जाएगा।”
दोनों गुटों के पास क्या-क्या सबूत हैं
चुनाव आयोग में कागजों की जंग चल रही है।
ममता गुट के पास:
- 198 विधायकों के हलफनामे
- 5 सांसदों का समर्थन पत्र
- 22 जिला अध्यक्षों में से 18 का समर्थन
- पार्टी का बैंक खाता जिसमे 400 करोड़ रुपये
- 1998 से पार्टी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट
रितब्रत गुट के पास:
- 15 विधायकों का समर्थन
- 1 सांसद का समर्थन
- 4 जिला अध्यक्ष
- दावा कि ममता गुट ने 2024 के बाद कार्यकारिणी की बैठक नहीं बुलाई
- दावा कि 30% बूथ कमेटी उनके साथ है
आयोग अब गिनेगा कि जमीन पर संगठन किसके पास है।
पहले भी ऐसे मामले हुए हैं, इतिहास क्या कहता है
ये पहला मामला नहीं है। चुनाव आयोग पहले भी पार्टियों के निशान फ्रीज कर चुका है।
1999: शिवसेना: बाल ठाकरे बनाम नारायण राणे। निशान फ्रीज नहीं हुआ क्योंकि बाल ठाकरे के पास बहुमत था।
2017: AIADMK: जयललिता के बाद पनीरसेल्वम बनाम पलानीस्वामी। दो पत्ती का निशान 6 महीने फ्रीज रहा। फिर पलानीस्वामी गुट को मिला।
2022: शिवसेना: उद्धव बनाम शिंदे। धनुष-बाण फ्रीज हुआ। बाद में शिंदे गुट को मिला।
मतलब आयोग का ट्रेंड है “जिसके पास विधायक ज्यादा, निशान उसका।” इस हिसाब से ममता गुट भारी है। लेकिन रितब्रत गुट कह रहा है “हमारे पास नैतिकता है।”
BJP और CPM क्या कर रहे हैं, कार्यकर्ता और जनता क्या कह रही है
दोनों मुख्य विपक्षी पार्टियां इस लड़ाई को टीवी पर देख रही हैं और अंदर से खुश हैं। BJP के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा “TMC अब टूट चुकी है। जोड़ा फूल गया तो बंगाल में BJP आएगी।” CPM ने कहा “ये परिवारवाद का नतीजा है। अब जनता तीसरा विकल्प चुनेगी।” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर निशान फ्रीज हुआ तो BJP को नंदीग्राम में 5-7% का फायदा हो सकता है।
कोलकाता के एक बूथ अध्यक्ष ने कहा “हम 25 साल से जोड़ा फूल के लिए काम कर रहे हैं। अब अगर नया निशान आया तो गांव में समझाने में 2 महीने लग जाएंगे।” नंदीग्राम की एक महिला वोटर ने कहा “दी का फूल देखकर वोट देते हैं। अब अगर दो फूल होंगे तो किसको देंगे?” सोशल मीडिया पर #SaveJoraPhool ट्रेंड कर रहा है। ममता समर्थक पोस्ट कर रहे हैं “चोर चिन्ह चुरा रहे हैं।”
अगर निशान फ्रीज हुआ तो क्या होगा
चुनाव आयोग के पास 3 ऑप्शन हैं।
ऑप्शन 1: ममता गुट को असली मानकर जोड़ा फूल दे देना। रितब्रत गुट को नया नाम और निशान।
ऑप्शन 2: दोनों को फ्रीज करके दोनों को नया निशान देना। ये सबसे खतरनाक है।
ऑप्शन 3: उपचुनाव तक अंतरिम व्यवस्था। ममता गुट को जोड़ा फूल, रितब्रत को “जोड़ा फूल के साथ छड़ी” जैसा अलग निशान।
सूत्रों का कहना है आयोग ऑप्शन 1 की तरफ झुका है। क्योंकि आंकड़े ममता के साथ हैं। लेकिन रितब्रत गुट कह चुका है “अगर निशान नहीं मिला तो हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।”
आगे का रोडमैप
आज गुरुवार को आयोग की सुनवाई है।
19 सितंबर तक चुनाव चिन्ह फाइनल होना है।
20 सितंबर से नामांकन।
6 अक्टूबर को वोटिंग।
10 अक्टूबर को नतीजे।
मतलब अगले 10 दिन बंगाल की राजनीति के लिए बहुत अहम हैं।TMC के लिए “जोड़ा फूल” सिर्फ एक निशान नहीं है। ये 28 साल की मेहनत, 3 बार की सरकार और करोड़ों कार्यकर्ताओं की पहचान है। अब सवाल ये है कि क्या चुनाव आयोग ममता के पास बहुमत देखकर उन्हें निशान देगा? या फिर बंटवारे की वजह से दोनों को नया निशान लेना पड़ेगा? एक बात तय है। 6 अक्टूबर का उपचुनाव अब सिर्फ नंदीग्राम और रेजीनगर की लड़ाई नहीं रहा। ये TMC के अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। ममता बनर्जी ने कल कहा “जोड़ा फूल कोई छीन नहीं सकता। ये जनता का है।” रितब्रत बनर्जी ने कहा “असली TMC हम हैं। जनता फैसला करेगी।” अब फैसला चुनाव आयोग करेगा। और उसके बाद बंगाल की जनता।