पद कितने हों ये संसद तय करे, सजा पर हम देखेंगे… वंदे मातरम विवाद में सुप्रीम कोर्ट, जबरदस्ती देशभक्ति नहीं हो सकती: वंदे मातरम केस में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी,सजा वाले नियम पर रोक के संकेत
नई दिल्ली। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को “वंदे मातरम” को लेकर चल रहे विवाद पर सुनवाई करते हुए अपना रुख बिल्कुल साफ कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रगीत में कितने पद होने चाहिए ये तय करना हमारा काम नहीं है। ये फैसला संसद और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को करना है। लेकिन साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्था या अंतरात्मा की आवाज के कारण वंदे मातरम नहीं गाता है तो क्या उसे आपराधिक सजा दी जा सकती है, इस सवाल की जांच जरूर होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के सामने मामला प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। टी.एम. कृष्णा ने अपनी याचिका में दो बातों को चुनौती दी है। पहली ये कि 2026 में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में किए गए संशोधन के तहत वंदे मातरम के सभी 6 पद गाना अनिवार्य कर दिया गया है। दूसरी ये कि अगर कोई व्यक्ति इसे नहीं गाता है तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान भी जोड़ा गया है।
टी.एम. कृष्णा का तर्क है कि वंदे मातरम के पहले दो पद बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना के वो हिस्से हैं जिन्हें आमतौर पर राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाता रहा है। लेकिन अंतिम चार पदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। उनकी याचिका में कहा गया है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां हर धर्म के लोग रहते हैं। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा इसकी इजाजत नहीं देती कि वो उन पदों को गाए जिनमें किसी विशेष धर्म के प्रतीक हैं तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। और अगर वो नहीं गाता है तो उसे सजा देने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। पीठ ने इस दलील को गंभीरता से सुना। करीब एक घंटे चली सुनवाई में सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल भी मौजूद थे। कोर्ट ने शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया कि हम इस बहस में नहीं पड़ेंगे कि वंदे मातरम में 2 पद होने चाहिए या 6। ये तय करना विधायिका का काम है। राष्ट्रगीत क्या होगा, राष्ट्रीय आकांक्षाओं को किस रूप में व्यक्त किया जाएगा, देश की पहचान किस प्रतीक से होगी, ये सब नीतिगत फैसले हैं और इन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी गई सरकार और संसद ही तय कर सकती है। अदालत का काम कानून की संवैधानिकता जांचना है, नीति बनाना नहीं।
लेकिन इसके तुरंत बाद पीठ ने दूसरा और ज्यादा अहम सवाल उठाया। सवाल ये था कि क्या राज्य किसी नागरिक को अपनी अंतरात्मा या धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगीत न गाने पर दंडित कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि ये सवाल संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। साथ ही अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। अगर कोई व्यक्ति सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, राष्ट्रगीत का अनादर नहीं करता, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यता के कारण उसे नहीं गाता तो क्या उसे जेल भेजा जा सकता है। इस बिंदु पर पीठ ने 1986 के ऐतिहासिक “बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य” मामले का जिक्र किया। उस मामले में केरल के तीन बच्चे जीहोवा विटनेस संप्रदाय से थे। उन्होंने स्कूल में प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया था। उनका कहना था कि उनके धर्म में किसी राष्ट्र या व्यक्ति की स्तुति करना वर्जित है। वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े हो जाते थे लेकिन गाते नहीं थे। स्कूल ने उन्हें निकाल दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। तब की पीठ ने फैसला दिया था कि सम्मानपूर्वक खड़ा रहना भी राष्ट्र के प्रति सम्मान दिखाना है। केवल न गाने के कारण किसी को दंडित नहीं किया जा सकता। ये फैसला आज भी देश का कानून है और आज तक इसे पलटा नहीं गया है।
वर्तमान पीठ ने कहा कि बिजो इमैनुएल का फैसला हमारे सामने है और उसके सिद्धांत अभी भी लागू हैं। अगर कोई व्यक्ति धार्मिक कारण या अंतरात्मा की आवाज के कारण वंदे मातरम नहीं गाता लेकिन उसका अपमान भी नहीं करता तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करना संविधान के खिलाफ हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि हम इसी बिंदु की जांच करेंगे। सरकार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा जाएगा कि 2026 के संशोधन में सजा का प्रावधान जोड़ते समय इन संवैधानिक पहलुओं पर विचार क्यों नहीं किया गया। सुनवाई के दौरान पीठ ने ये भी कहा कि राष्ट्र के प्रति सम्मान और व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। कोई भी देश अपने राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान चाहता है। इसलिए सजा का प्रावधान जरूरी है ताकि लोग इसे गंभीरता से लें। लेकिन याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया कि समस्या सजा में है। अगर सरकार जागरूकता फैलाए, स्कूलों में समझाए, तो लोग खुद गाएंगे। लेकिन कानून के डर से गवाना सही नहीं है। खासकर तब जब अंतिम चार पदों की भाषा और भाव कुछ समुदायों को असहज कर सकते हैं।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुना और कहा कि हम अभी अंतिम फैसला नहीं दे रहे हैं। पहले सरकार से जवाब लेंगे। साथ ही हम ये भी देखेंगे कि 2026 का संशोधन लाने के पीछे क्या उद्देश्य था और क्या उसमें धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को ध्यान में रखा गया था या नहीं।इस सुनवाई के बाद कानूनी गलियारों में चर्चा है कि कोर्ट का फोकस बिल्कुल साफ है। कोर्ट राष्ट्रगीत के पदों की संख्या में नहीं उलझेगा। वो राजनीति और नीति के मामले को संसद पर छोड़ेगा। लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जब बात आएगी तो कोर्ट अपनी भूमिका निभाएगा। सामाजिक स्तर पर भी इस मामले को लेकर बहस तेज है। कुछ लोग कह रहे हैं कि राष्ट्रगीत का पूरा रूप ही गाया जाना चाहिए। ये देशभक्ति का सवाल है। वहीं दूसरे लोग कह रहे हैं कि जबरदस्ती देशभक्ति नहीं हो सकती। संविधान ने हमें सोचने और मानने की आजादी दी है।
ये मामला अब आने वाले महीनों में देश की सबसे बड़ी संवैधानिक बहसों में से एक बन सकता है। क्योंकि इसमें राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून का दायरा सभी एक साथ आ गए हैं। और आखिरी फैसला जो भी आए, वो देश के हर नागरिक के अधिकारों को परिभाषित करेगा।