UP में चुनाव आयोग का ऐलान, अक्टूबर में राज्यसभा-MLC की 21 सीटों पर वोटिंग, 2027 की लड़ाई शुरू
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक डेढ़ साल पहले अक्टूबर में होने वाले राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव को सियासी गलियारों में 2027 का सेमीफाइनल कहा जाने लगा है। चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 10 सीटों और विधान परिषद की 11 सीटों के लिए तारीखों का ऐलान कर दिया है। यानी कुल 21 सीटों पर वोटिंग होगी और ये 21 सीटें तय करेंगी कि 2027 में किसका पलड़ा भारी रहेगा। अब सवाल है कि भला 21 सीटों के चुनाव को सेमीफाइनल क्यों कहा जा रहा है। वजह बहुत सीधी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में संख्या ही ताकत है और ये 21 सीटें सीधे तौर पर बताती हैं कि सदन में किस पार्टी के पास कितने विधायक हैं। राज्यसभा का चुनाव विधायक ही करते हैं और विधान परिषद का चुनाव भी विधायक, सांसद, स्थानीय निकाय और शिक्षक-ग्रेजुएट करते हैं। इसका मतलब ये हुआ कि अक्टूबर में जो नतीजे आएंगे वो इस बात का ट्रेलर होंगे कि 2027 में विधानसभा में किसके पास कितनी ताकत है।
बीजेपी के लिए ये चुनाव बहुत अहम है। योगी आदित्यनाथ सरकार को 2022 में दोबारा बड़ी जीत मिली थी लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को झटका लगा। 80 में से 33 सीटें ही बीजेपी जीत पाई। सपा ने 37 सीटें निकाल कर सबको चौंका दिया। उसके बाद से अखिलेश यादव लगातार हमलावर हैं और कह रहे हैं कि 2027 में सरकार उनकी बनेगी। ऐसे में बीजेपी के पास साबित करने का मौका है कि 2024 एक भूल थी और जमीन पर संगठन अब भी मजबूत है। अगर राज्यसभा और MLC की ज्यादातर सीटें बीजेपी जीत लेती है तो इसका सीधा संदेश जाएगा कि विधायक अब भी योगी और मोदी के साथ हैं।
वहीं सपा के लिए ये इज्जत की लड़ाई है। अखिलेश यादव ने 2024 में पीडीए का फॉर्मूला चला कर बीजेपी को बैकफुट पर धकेल दिया था। अब वो इसे 2027 तक ले जाना चाहते हैं। सपा को पता है कि राज्यसभा और MLC चुनाव में विधायकों का गणित मायने रखता है। अभी विधानसभा में बीजेपी के पास 255 विधायक हैं। सपा के पास 108, कांग्रेस के 2, RLD के 13 और बाकी छोटी पार्टियों के पास हैं। राज्यसभा की 10 सीटों के लिए करीब 37-38 विधायकों के वोट से एक सीट निकलती है। इस हिसाब से बीजेपी आराम से 6 से 7 सीटें जीत सकती है। लेकिन सपा चाहेगी कि क्रॉस वोटिंग हो और वो 3-4 सीटें छीन ले। अगर सपा 4 सीट भी निकाल लेती है तो वो 2027 के लिए बहुत बड़ा मनोबल होगा।
विधान परिषद की 11 सीटें और दिलचस्प हैं। इनमें 9 सीटें स्थानीय निकाय की हैं, एक शिक्षक और एक ग्रेजुएट की। स्थानीय निकाय का चुनाव मतलब जिला पंचायत सदस्य, बीडीसी, नगर पंचायत चेयरमैन सब वोट करेंगे। यहां जमीनी कार्यकर्ता की ताकत दिखती है। बीजेपी का बूथ लेवल का संगठन सबसे मजबूत माना जाता है। इसलिए वो यहां भी बढ़त लेना चाहेगी। लेकिन सपा ने पंचायत चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था। अखिलेश का दावा है कि गांव-गांव में उनकी पकड़ बढ़ी है। अगर MLC में सपा 4-5 सीट जीत जाती है तो इसका मतलब होगा कि ग्रामीण इलाकों में बीजेपी का वोट खिसका है। इस चुनाव को सेमीफाइनल इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि यहां से दोनों पार्टियों की 2027 की रणनीति तय होगी। बीजेपी अगर हारती है तो उसे संगठन में बदलाव करना पड़ेगा। मंत्री बदले जाएंगे, जिलाध्यक्ष बदले जाएंगे, टिकट की लिस्ट में फेरबदल होगा। योगी सरकार पर भी दबाव बढ़ेगा कि वो और तेजी से काम करें। वहीं अगर सपा हारती है तो अखिलेश को अपने पीडीए फॉर्मूले पर फिर से काम करना पड़ेगा। गठबंधन में कांग्रेस और RLD की भूमिका पर सवाल उठेंगे। और अगर सपा जीतती है तो 2027 से पहले ही वो सरकार बनाने का दावा ठोक देगी।
उम्मीदवारों के नाम को लेकर भी खूब चर्चा है। बीजेपी की तरफ से राज्यसभा के लिए केंद्रीय मंत्रियों या बड़े नेताओं को भेजा जा सकता है ताकि दिल्ली में यूपी की पैरवी मजबूत हो। चर्चा है कि एक-दो सीटें सहयोगी दलों RLD और अपना दल को भी दी जा सकती हैं। सपा की तरफ से अखिलेश अपने करीबी लोगों को आगे करेंगे। मुस्लिम और यादव चेहरों के साथ-साथ दलित और पिछड़े वर्ग से भी उम्मीदवार उतारे जाएंगे ताकि पीडीए का संदेश जाए।क्रॉस वोटिंग का डर दोनों को सता रहा है। 2016 और 2018 में राज्यसभा चुनाव में यूपी में कई बार क्रॉस वोटिंग हुई है। बीजेपी को डर है कि कहीं उसके नाराज विधायक सपा के साथ ना चले जाएं। सपा को डर है कि कहीं ईडी-सीबीआई के डर से उसके विधायक टूट ना जाएं। इसलिए दोनों पार्टियों ने अपने विधायकों को रिसॉर्ट में रखने की तैयारी शुरू कर दी है। वोटिंग से पहले विधायकों की ट्रेनिंग होगी कि वोट कैसे डालना है। एक भी वोट खराब हुआ तो हार-जीत तय हो सकती है।
जनता के बीच इसका मैसेज भी जाएगा। आम आदमी ये देखेगा कि विधायक किसके साथ हैं। अगर बीजेपी ज्यादा सीट जीतती है तो लोग मानेंगे कि सरकार का काम ठीक चल रहा है। अगर सपा बढ़त लेती है तो लोग मानेंगे कि हवा बदल गई है। मीडिया भी इसी एंगल से कवरेज करेगा। इसलिए ये चुनाव सिर्फ 21 सीटों का नहीं है, ये पूरे यूपी के मूड का चुनाव है। कांग्रेस और बसपा की भूमिका भी अहम है। कांग्रेस के पास सिर्फ 2 विधायक हैं तो वो खुद तो नहीं जीत सकती लेकिन किसे वोट देगी ये तय करेगी। बसपा के पास इस बार विधानसभा में कोई विधायक नहीं है इसलिए वो सीधे नहीं लड़ रही लेकिन उसके वोटर किस तरफ जाएंगे ये 2027 में असर डालेगा। RLD जयंत चौधरी के साथ है। वो बीजेपी के साथ हैं लेकिन पश्चिमी यूपी में किसान नाराज है तो देखना होगा कि RLD के वोटर कितना साथ देते हैं।
अक्टूबर में वोटिंग के बाद नतीजे आते ही दोनों पार्टियां उसे 2027 से जोड़ देंगी। बीजेपी कहेगी कि डबल इंजन सरकार को जनता का समर्थन मिला है। सपा कहेगी कि जनता ने बीजेपी को नकार दिया है। असल में ये दोनों ही अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए करेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यूपी में चुनाव कभी छोटे नहीं होते। यहां हर चुनाव 2027 की तरफ इशारा करता है। 2024 लोकसभा हारने के बाद बीजेपी के पास ये आखिरी बड़ा टेस्ट है। और सपा के पास साबित करने का मौका है कि 2024 फ्लूक नहीं था। इसलिए अक्टूबर की 21 सीटें सिर्फ राज्यसभा और MLC नहीं हैं, ये यूपी की सत्ता की दिशा तय करेंगी। अभी से लखनऊ में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री, प्रभारी सब फील्ड में उतर गए हैं। अखिलेश भी हर जिले में वर्चुअल मीटिंग कर रहे हैं। पोस्टर, बैनर, सोशल मीडिया कैंपेन सब शुरू हो गया है।
कुल मिलाकर यूपी में चुनावी बिगुल बज चुका है। अक्टूबर में राज्यसभा और MLC की 21 सीटों पर जो होगा वही 2027 का सेमीफाइनल होगा। जीतने वाले को बढ़त मिलेगी, हारने वाले को मेहनत दोगुनी करनी पड़ेगी। और जनता देख रही है कि किसके दावे में कितना दम है।