“बंद दरवाजा बंद होते ही…’: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने वरिष्ठता तोड़कर 4,5,6 नंबर के HC जजों को चुना, टॉप 3 को नजरअंदाज करने पर उठे सवाल”
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने सोमवार को तीन हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की है। कॉलेजियम ने गुजरात हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सुनीता अग्रवाल, दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और तेलंगाना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अपरेश कुमार सिंह के नाम केंद्र सरकार को भेजे हैं।
लेकिन इस सिफारिश के जारी होते ही विवाद शुरू हो गया। सोशल मीडिया X पर एक पूर्व सिविल सर्वेंट, एक पत्रकार और एक रिटायर्ड मैकेनिकल इंजीनियर ने सवाल उठाया कि कॉलेजियम ने अखिल भारतीय वरिष्ठता सूची में नंबर 1, 2, 3 को छोड़कर 4, 5 और 6 नंबर के जजों को क्यों चुना? “बंद दरवाजे के पीछे पारदर्शिता कहां है” ये सवाल अब जोर पकड़ रहा है।
कॉलेजियम ने क्या सिफारिश की, कौन हैं 3 नाम
सोमवार को CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले 5 सदस्यीय कॉलेजियम ने प्रस्ताव पास कर केंद्र को भेजा।
जस्टिस सुनीता अग्रवाल: वर्तमान में गुजरात हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश। इलाहाबाद हाईकोर्ट से प्रमोट होकर आई थीं। महिला जजों में वरिष्ठ मानी जाती हैं।
जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय: दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश। पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में थे। प्रशासनिक अनुभव अच्छा माना जाता है।
जस्टिस अपरेश कुमार सिंह: तेलंगाना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश। पहले झारखंड हाईकोर्ट में जज रहे।
तीनों की नियुक्ति होने पर सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 34 में से 32 हो जाएगी। अभी 2 पद खाली हैं। कॉलेजियम ने प्रस्ताव में कहा कि “तीनों की योग्यता, सत्यनिष्ठा और अनुभव को देखते हुए सिफारिश की जाती है।” लेकिन प्रस्ताव में ये नहीं बताया कि बाकी वरिष्ठ जजों को क्यों छोड़ा गया।
विवाद की जड़: वरिष्ठता को क्यों नजरअंदाज किया गया
सुप्रीम कोर्ट की परंपरा रही है कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की अखिल भारतीय वरिष्ठता के आधार पर प्रमोशन होता है। वर्तमान वरिष्ठता सूची के अनुसार:
नंबर 1: जस्टिस एन.वी. अंजारिया – कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
नंबर 2: जस्टिस विजय बिश्नोई – राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
नंबर 3: जस्टिस सुधांशु धूलिया – पहले उत्तराखंड HC के CJ, अब SC जज
नंबर 4: जस्टिस सुनीता अग्रवाल
नंबर 5: जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय
नंबर 6: जस्टिस अपरेश कुमार सिंह
सवाल ये है कि टॉप 3 को छोड़कर 4,5,6 को क्यों चुना गया?
X पर पूर्व IAS अधिकारी ने लिखा “Collegium system is a black box. Seniority is the only objective criteria left. If that is also ignored without reason, then what is the basis?”
पत्रकार ने पोस्ट किया “बंद दरवाजा बंद होते ही सब तय हो जाता है। जनता को कारण जानने का हक है।”
रिटायर्ड इंजीनियर ने लिखा “Merit + Seniority दोनों चाहिए। सिर्फ merit कहकर वरिष्ठता तोड़ना खतरनाक precedent है।”
कॉलेजियम सिस्टम कैसे काम करता है, नियम क्या कहते हैं
भारत में जजों की नियुक्ति “कॉलेजियम सिस्टम” से होती है। ये Second और Third Judges Case से आया। प्रक्रिया: CJI + 4 वरिष्ठतम जज मिलकर नाम तय करते हैं। प्रस्ताव केंद्र को जाता है। केंद्र 6 हफ्ते में फाइल लौटा सकता है। अगर कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेजे तो सरकार को नियुक्ति करनी होती है।
मापदंड: संविधान में लिखा है – “योग्यता, सत्यनिष्ठा और अनुभव”। वरिष्ठता का जिक्र नहीं है। लेकिन 1998 के Third Judges Case में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “वरिष्ठता को सामान्यतः ध्यान में रखा जाए।” पारदर्शिता: 2017 से कॉलेजियम अपने प्रस्ताव वेबसाइट पर डालता है। लेकिन “क्यों चुना, क्यों छोड़ा” का कारण नहीं बताता। कानून मंत्री किरेन रिजिजू पहले भी कह चुके हैं कि “कॉलेजियम में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं है।”
पहले भी टूटी है वरिष्ठता, क्या थे कारण
ये पहली बार नहीं है जब वरिष्ठता तोड़ी गई।
2016: जस्टिस यूयू ललित को सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट जज बनाया गया। वरिष्ठता का सवाल ही नहीं था।
2018: जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस विनीत सरन को प्रमोट किया गया। उस समय वरिष्ठता सूची में उनसे ऊपर 2 जज थे। कारण बताया गया था “क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और जेंडर बैलेंस।”
2021: 9 जजों की एक साथ नियुक्ति में भी 2-3 वरिष्ठ HC CJ को छोड़ दिया गया था। कारण था “सामाजिक विविधता।”
कॉलेजियम का तर्क रहा है कि सिर्फ वरिष्ठता से काम नहीं चलता। क्षेत्र, समुदाय, जेंडर और विशेषज्ञता का संतुलन भी जरूरी है। इस बार भी माना जा रहा है कि महिला प्रतिनिधित्व – जस्टिस सुनीता अग्रवाल, और अलग-अलग हाईकोर्ट से प्रतिनिधित्व को तरजीह दी गई।
एक्सपर्ट और वकीलों की राय, पक्ष और विपक्ष
पक्ष में: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण कहते हैं “वरिष्ठता अकेला मापदंड नहीं हो सकती। अगर कोई जज प्रशासन में कमजोर है या फैसलों की गुणवत्ता ठीक नहीं तो उसे छोड़ना गलत नहीं।”
विपक्ष में: पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल कहते हैं “हर बार कारण बताए बिना वरिष्ठता तोड़ोगे तो HC जजों का मनोबल गिरेगा। लोग सोचेंगे लॉबिंग से प्रमोशन होता है।” बार काउंसिल: SCBA के अध्यक्ष ने कहा “कॉलेजियम को कम से कम 2 लाइन का कारण देना चाहिए कि किस आधार पर वरिष्ठता तोड़ी।”
सरकार की भूमिका क्या होगी, आगे क्या प्रक्रिया
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है।
स्टेप 1: कानून मंत्रालय IB और R&AW से तीनों जजों का बैकग्राउंड चेक कराएगा।
स्टेप 2: फाइल PMO से होते हुए राष्ट्रपति के पास जाएगी।
स्टेप 3: नियुक्ति की अधिसूचना जारी होगी।
सरकार के पास 2 विकल्प हैं:
A. बिना सवाल किए नियुक्ति कर दे।
B. फाइल वापस कर पूछे कि वरिष्ठता क्यों तोड़ी।
लेकिन अगर सरकार लौटाती है और कॉलेजियम दोबारा वही नाम भेजता है तो सरकार को मानना ही पड़ेगा।
सूत्रों के मुताबिक सरकार इस बार सवाल उठा सकती है क्योंकि “वरिष्ठता तोड़ने” का मुद्दा संसद में भी उठ चुका है।
इसका असर क्या होगा, न्यायपालिका पर सवाल
पॉजिटिव असर: तीनों जज अनुभवी हैं। महिला प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। अलग-अलग क्षेत्र से जज आएंगे।
निगेटिव असर:
- HC जजों में असंतोष: जो टॉप 3 में थे और छूट गए, उनके लिए संदेश गलत जाएगा।
- पारदर्शिता पर सवाल: “बंद दरवाजा” वाली आलोचना फिर शुरू।
- जनता का भरोसा: आम आदमी को लगेगा कि सब अंदर ही अंदर तय होता है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि अब समय आ गया है कि कॉलेजियम अपने प्रस्ताव के साथ एक छोटा “Reason Note” भी जारी करे। जैसे “हमने वरिष्ठता इसलिए तोड़ी क्योंकि…” इससे अटकलें बंद होंगी। जजों की नियुक्ति में सिर्फ योग्यता नहीं, प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी जरूरी है। वरिष्ठता तोड़ना गलत नहीं, लेकिन कारण बताना जरूरी है। वरना “बंद दरवाजा बंद होते ही…” वाला तंज लगता रहेगा। अब देखना होगा कि सरकार क्या करती है और कॉलेजियम आगे पारदर्शिता के लिए क्या कदम उठाता है।