“हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: समान काम-समान वेतन सांविधानिक अधिकार, सरकार की दलील खारिज; आय प्रमाणपत्र और दुकान खाली कराने पर भी अहम आदेश”
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस हफ्ते 3 बड़े फैसले सुनाए हैं जिनका असर सीधे सरकारी कर्मचारियों, आम जनता और मकान मालिक-किरायेदारों पर पड़ेगा। सबसे अहम फैसला समान काम के लिए समान वेतन को लेकर आया है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की एकलपीठ ने कहा कि “समान काम के लिए समान वेतन” सिर्फ नारा नहीं है, ये संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत एक सांविधानिक लक्ष्य है।
कोर्ट ने सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया कि वेतनमान तय करना सिर्फ कार्यपालिका का काम है और अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती। साथ ही आय प्रमाणपत्र और शिमला की एक दुकान को खाली कराने के मामले में भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।
समान काम-समान वेतन: कोर्ट बोला “ये नारा नहीं, अधिकार है”
हिमाचल हाईकोर्ट ने विजय रानी गुप्ता बनाम हिमाचल सरकार मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर दो विभागों में कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता, काम का स्वरूप और जिम्मेदारी एक जैसी है तो सिर्फ विभाग अलग होने के कारण कम वेतन देना भेदभाव है।
कोर्ट ने कहा “अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है और अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरी में समान अवसर की गारंटी देता है। समान काम के लिए समान वेतन इसी का हिस्सा है। इसे सिर्फ नारे तक सीमित नहीं रखा जा सकता।” सरकार ने दलील दी थी कि वेतनमान तय करना कार्यपालिका का विशेषाधिकार है। कोर्ट ने कहा कि जब कार्यपालिका खुद तर्कहीन और भेदभावपूर्ण नीति बनाती है तो न्यायपालिका मूकदर्शक नहीं रह सकती। “अगर हम दखल नहीं देंगे तो संविधान के मूल अधिकार बेमानी हो जाएंगे।”
केस की पृष्ठभूमि क्या थी
याचिकाकर्ता विजय रानी गुप्ता को 1991 में HPPSC के जरिए कृषि विभाग में आर्ट/क्राफ्ट टीचर के पद पर 950-1800 रुपये के वेतनमान पर नियुक्त किया गया। ठीक इसी साल, इसी योग्यता और इसी चयन प्रक्रिया से ग्रामीण विकास विभाग में जूनियर टेलरिंग मिस्ट्रेस की भर्ती हुई। उन्हें 1350-2400 रुपये का वेतनमान दिया गया। दोनों का काम, योग्यता और प्रमोशन चैनल लगभग समान था। लेकिन वेतन में 400 रुपये का बेसिक फर्क था। विजय रानी ने वेतन विसंगति दूर करने के लिए सरकार को आवेदन दिया। सरकार ने खारिज कर दिया। तर्क दिया कि “आपने नियुक्ति के समय ये वेतन स्वीकार किया था” और “पंजाब पैटर्न के अनुसार उच्च वेतन नहीं दे सकते।” इसके बाद विजय रानी हाईकोर्ट पहुंचीं। 35 साल बाद कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया।
कोर्ट ने क्या कहा
न्यायाधीश भारद्वाज ने कहा कि “स्टेट एक मॉडल एम्प्लॉयर है। उसे अपने कर्मचारियों में भेदभाव नहीं करना चाहिए।” कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को जूनियर टेलरिंग मिस्ट्रेस के बराबर वेतनमान दिया जाए और एरियर का भी भुगतान हो। ये फैसला हिमाचल के हजारों पैरा टीचर, अनुबंध कर्मी और अलग-अलग विभागों में समान पदों पर काम कर रहे लोगों के लिए मिसाल बनेगा।
मामला क्या था
घुमारवीं के आंगनबाड़ी केंद्र कोठी-2 में 2007 में एक महिला का चयन आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर हुआ। याचिकाकर्ता कुसुम लता ने आरोप लगाया कि चयनित महिला के पिता की आय नियमों से ज्यादा है। तत्कालीन नियमों के अनुसार पात्रता के लिए अधिकतम वार्षिक आय सीमा 12,000 रुपये थी।
तहसीलदार की जांच में पता चला कि चयनित महिला के पिता ने 2006-2007 में राजमिस्त्री का काम करके 18,000 रुपये से ज्यादा कमाए थे। तहसीलदार ने 30 अगस्त 2011 को आय प्रमाणपत्र रद्द कर दिया। लेकिन एसडीओ सिविल ने अपील में कहा कि “मौसमी काम की आय को बीपीएल नियमों में नहीं जोड़ा जाएगा।” और प्रमाणपत्र बहाल कर दिया। कुसुम लता हाईकोर्ट गईं। कोर्ट ने एसडीओ के आदेश को “कानून की नजर में अमान्य” करार देते हुए रद्द कर दिया।
आय प्रमाणपत्र में हर आय जोड़ना जरूरी: मौसमी मजदूरी भी गिनी जाएगी न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने आय प्रमाणपत्र को लेकर बड़ा फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि आय प्रमाणपत्र बनाते समय परिवार की सभी स्रोतों से हुई आय को जोड़ना अनिवार्य है। चाहे वो दिहाड़ी हो, मस्टर रोल हो या मौसमी काम।
कोर्ट की टिप्पणी
न्यायाधीश गोयल ने कहा “आय प्रमाणपत्र का मकसद ही परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति सामने लाना है। अगर मौसमी आय को छोड़ देंगे तो जिसके पास साल भर काम नहीं है और जिसके पास 6 महीने काम है, दोनों बराबर हो जाएंगे। ये भेदभाव होगा।” कोर्ट ने निर्देश दिए कि अब से सभी तहसीलदार आय प्रमाणपत्र बनाते समय फॉर्म में स्पष्ट कॉलम भरें कि आय का स्रोत क्या है।
कोर्ट ने क्या कहा
न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज ने तल्ख टिप्पणी की “अपनी संपत्ति का उपयोग कैसे करना है, ये तय करने का अधिकार सिर्फ मकान मालिक का है। किरायेदार ये नहीं बता सकता कि मालिक अपनी दुकान का क्या करे।” कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि “वास्तविक आवश्यकता” का आकलन याचिका दायर करने की तारीख से होगा, न कि केस खत्म होने की तारीख से। 15 साल केस लटकने के बाद ये न कहा जाए कि अब जरूरत नहीं रही। हाईकोर्ट ने रिव्यू पिटीशन खारिज कर दी और किरायेदार को दुकान खाली करने के आदेश बरकरार रखे।
सरकार की दलीलें क्यों खारिज हुईं
तीनों मामलों में सरकार और प्रशासन ने लगभग एक जैसी दलीलें दीं।
समान वेतन मामले में: सरकार ने कहा “वेतन नीति बनाना हमारा काम है। कोर्ट दखल न दे।” कोर्ट ने कहा “नीति बनाना आपका अधिकार है, लेकिन वो संविधान के खिलाफ नहीं हो सकती।”
आय प्रमाणपत्र मामले में: एसडीओ ने कहा “मौसमी आय गिनेंगे तो गरीब का प्रमाणपत्र नहीं बनेगा।” कोर्ट ने कहा “गरीबी छिपाने के लिए झूठा प्रमाणपत्र बनाना और बड़ा अन्याय है।”
दुकान मामले में: किरायेदार ने कहा “मालिक की जरूरत फर्जी है।” कोर्ट ने कहा “जरूरत को साबित करने का बोझ किरायेदार पर नहीं, मालिक के इरादे पर भरोसा करना होगा।”
कानूनी विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं
शिमला के वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेंद्र शर्मा कहते हैं “समान काम-समान वेतन वाला फैसला लैंडमार्क है। अब सरकार को ‘पंजाब पैटर्न’ और ‘अलग विभाग’ की आड़ नहीं मिलेगी।” वरिष्ठ अधिवक्ता मीना ठाकुर कहती हैं “आय प्रमाणपत्र वाला फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में कदम है। इससे सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचेगा।”
आगे की राह, सरकार को क्या करना होगा
पहला: 3 महीने के अंदर सभी विभागों में वेतन विसंगति की समीक्षा करनी होगी। जहां समान योग्यता और काम है वहां वेतन बराबर करना होगा।
दूसरा: सभी तहसीलदारों को आय प्रमाणपत्र बनाने की नई गाइडलाइन जारी होगी। मौसमी आय का कॉलम अनिवार्य होगा।
तीसरा: रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत लंबित मामलों में जल्दी निपटारा होगा। कोर्ट ने कहा कि 10 साल से ज्यादा पुराने केस प्राथमिकता पर सुनें।
हाईकोर्ट के इन 3 फैसलों ने एक बार फिर साबित किया कि न्यायपालिका सिर्फ कानून की किताब नहीं पढ़ती, वो समाज में बराबरी और इंसाफ भी सुनिश्चित करती है।