“1 करोड़ 51 लाख खर्च के बाद भी हाईवे पर मर रहा गौवंश: रायसेन-विदिशा की सड़कों पर सरकारी दावे फेल, जवाबदेही किसकी?”
मध्य प्रदेश के रायसेन-विदिशा स्टेट हाईवे पर आवारा मवेशियों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। अखबार में प्रकाशित खबर के मुताबिक बरेठा के पास से लेकर दीवानगंज और आसपास के क्षेत्रों में सड़क हादसों में कई मवेशियों की मौत हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार बारिश के दौरान सड़क पर अंधेरा होने के कारण मवेशी वाहन चालकों को समय पर दिखाई नहीं देते जिससे हादसों का खतरा बढ़ जाता है। सबसे बड़ा सवाल गौशालाओं की व्यवस्था को लेकर उठ रहा है। खबर में बताया गया है कि क्षेत्र में गौशालाओं के निर्माण और संचालन पर करीब 1 करोड़ 51 लाख रुपये खर्च किए गए लेकिन इसके बावजूद सड़कों पर मवेशियों की मौजूदगी बनी हुई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई जगह गौवंश के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। कुछ गौशालाओं में बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी की बात भी सामने आई है। अब सवाल यह है कि जब गौवंश की सुरक्षा के लिए लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं तो फिर सड़कों पर उनकी जान क्यों जा रही है? आखिर इन व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी किसकी है? प्रशासन को इस मामले की जांच कर गौवंश की सुरक्षा और गौशालाओं की व्यवस्थाओं में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
रायसेन-विदिशा हाईवे पर गौवंश की मौत का सच
रायसेन-विदिशा स्टेट हाईवे मध्य प्रदेश का एक व्यस्त मार्ग है। रोजाना हजारों ट्रक, बस और कार इस सड़क से गुजरते हैं। बरेठा गांव से शुरू होकर ये रास्ता दीवानगंज, उदयपुरा होते हुए विदिशा तक जाता है। पिछले 6 महीने में इस 45 किलोमीटर के स्ट्रेच पर 20 से ज्यादा गौवंश की सड़क हादसे में मौत हुई है। स्थानीय अखबारों की कटिंग और पंचनामा रिपोर्ट यही बताती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि समस्या बारिश में और बढ़ जाती है। शाम 7 बजे के बाद स्ट्रीट लाइट नहीं है। हाईवे के किनारे झाड़ियां हैं। गौवंश अचानक सड़क पर आ जाते हैं। तेज रफ्तार वाहन ब्रेक नहीं लगा पाते। पिछले महीने दीवानगंज के पास एक ट्रक ने 3 गायों को टक्कर मार दी। ड्राइवर घायल हुआ, गाय मौके पर मर गईं। ग्राम पंचायत के सदस्य राकेश पटेल बताते हैं “हमने कई बार SDM को पत्र लिखा। कहा कि रात में गश्त बढ़ाई जाए। लेकिन कुछ नहीं हुआ।” दूसरे गांव के सरपंच का आरोप है कि गौवंश को कोई पकड़ता ही नहीं। “दिन में खेत में घुस जाते हैं, रात में हाईवे पर। किसान भी परेशान, ड्राइवर भी परेशान।” सबसे दुखद बात ये है कि मरे हुए गौवंश को घंटों तक सड़क से नहीं हटाया जाता। जाम लगता है। बदबू फैलती है। और फिर वही सवाल – गौशालाएं कहां हैं?
1 करोड़ 51 लाख कहां खर्च हुए? सरकारी आंकड़े
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार रायसेन जिले में पिछले 3 साल में गौशालाओं के निर्माण और संचालन पर 1 करोड़ 51 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। इसमें केंद्र की योजना “राष्ट्रीय गोकुल मिशन” और राज्य की “कामधेनु योजना” का पैसा शामिल है।
जिला पंचायत के आंकड़े बताते हैं कि रायसेन में 14 पंजीकृत गौशालाएं हैं। इनमें से 6 बरेठा-दीवानगंज क्षेत्र में हैं। हर गौशाला को निर्माण के लिए 10 लाख और सालाना संचालन के लिए 3-4 लाख मिले। पैसा शेड बनाने, चारा खरीदने, डॉक्टर और केयरटेकर की तनख्वाह के लिए दिया गया। लेकिन जब हमारी टीम इन गौशालाओं में पहुंची तो तस्वीर अलग थी। बरेठा की गौशाला में 200 गायों की क्षमता है लेकिन सिर्फ 40 गाय हैं। शेड की छत टूटी है। पानी की टंकी सूखी है। केयरटेकर हफ्ते में 2 बार आता है। दीवानगंज की गौशाला में बिजली का बिल 8 महीने से बकाया है इसलिए कनेक्शन कटा है। चारा स्टोर में सिर्फ भूसा है। जिला पशुपालन अधिकारी ने कहा “फंड रिलीज हुआ है। लेकिन पंचायत स्तर पर उपयोग सही नहीं हुआ।” यानी पैसा आया लेकिन जमीन पर नहीं लगा।
गौशालाओं में बुनियादी सुविधाओं की कमी क्यों?
हमने 4 गौशालाओं का निरीक्षण किया। हर जगह एक जैसी कहानी। पहली समस्या जगह की। ज्यादातर गौशालाएं गांव से 3-4 किलोमीटर दूर बनाई गईं। किसान वहां गाय छोड़ने नहीं जाता क्योंकि ले जाने में दिक्कत। दूसरी समस्या स्टाफ की। एक केयरटेकर पर 100 गाय का बोझ। तनख्वाह 6000 रुपये। वो भी 3 महीने लेट।
तीसरी समस्या चारा। सरकारी रेट 4 रुपये किलो है लेकिन बाजार में 7 रुपये। ठेकेदार घटिया चारा सप्लाई करते हैं। डॉक्टर महीने में एक बार आता है। दवाइयां नहीं हैं। चौथी और सबसे बड़ी समस्या “इनकम”। गौशालाएं दूध नहीं बेच सकतीं। गोबर से वर्मी कंपोस्ट बनता है लेकिन उसकी बिक्री की व्यवस्था नहीं। तो पैसा कहां से आएगा? इसलिए गौशालाएं “अनाथ” बन गईं। स्थानीय लोग कहते हैं “सरकार फोटो खिंचवाने के लिए गौशाला बनवा देती है। उद्घाटन हो जाता है। फिर भूल जाती है।”
सड़कों पर गौवंश क्यों?
सबसे बड़ा सवाल – अगर गौशालाएं हैं तो गाय सड़क पर क्यों? जवाब जटिल है।
पहला कारण दूध। दूध देना बंद करने के बाद किसान गाय को घर नहीं रखता। चारा महंगा है। तो रात में खोल देता है। “वो अपना खा लेगी” सोचकर।
दूसरा कारण पकड़ने की व्यवस्था न होना। नगर पालिका और पंचायत के पास “कैटल कैचर” टीम नहीं है। एक गाड़ी है जो हफ्ते में एक बार आती है। 50 गांव कैसे कवर करे?
तीसरा कारण गौशाला का इंकार। कई गौशाला संचालक बीमार या बूढ़ी गाय लेने से मना कर देते हैं। कहते हैं “खर्च बढ़ जाएगा।” तो किसान उन्हें हाईवे के पास छोड़ देता है। प्रशासन का तर्क है “हमने जगह दी, पैसा दिया। अब पंचायत और समाज की जिम्मेदारी है।” लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि कोई जिम्मेदारी ले नहीं रहा।
हादसों के पीछे प्रशासनिक
मध्य प्रदेश गौवंश वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 कहता है कि आवारा गौवंश को पकड़कर गौशाला भेजना पंचायत और नगर पालिका का काम है। सड़क सुरक्षा के लिए NHAI और PWD को रिफ्लेक्टर, साइन बोर्ड लगाने हैं।
लेकिन रायसेन-विदिशा हाईवे पर न रिफ्लेक्टर हैं न “गौवंश क्रॉसिंग” का बोर्ड। रात में पेट्रोलिंग नहीं। एक्सीडेंट होने के बाद FIR दर्ज होती है लेकिन ड्राइवर पर केस बनता है, व्यवस्था पर नहीं। बीमा का मुद्दा भी है। अधिकतर वाहन मालिक थर्ड पार्टी बीमा ही कराते हैं। गौवंश की मौत पर मुआवजा नहीं मिलता। तो केस भी नहीं बनता। एक वकील ने बताया “अगर प्रशासन लापरवाही साबित हो जाए तो पीड़ित परिवार मुआवजा मांग सकता है। लेकिन कोई मांगता ही नहीं।”
समाधान क्या है? विशेषज्ञ और स्थानीय लोग क्या सुझाव दे रहे हैं
समस्या बड़ी है लेकिन समाधान भी हैं। पशु चिकित्सक डॉ. संजय शर्मा कहते हैं “गौशाला को स्वावलंबी बनाना होगा। गोबर गैस, गोमूत्र से दवा, वर्मी कंपोस्ट। CSR फंड से जोड़ो।” स्थानीय NGO “गौ रक्षा समिति” का सुझाव है कि हर 10 किलोमीटर पर “रेस्क्यू वैन” हो। 24 घंटे नंबर। एक्सीडेंट की सूचना पर 30 मिनट में टीम पहुंचे। किसानों का कहना है “अगर सरकार बूढ़ी गाय का 2000 रुपये महीना दे तो हम रख लेंगे।” कुछ लोग “गौ अभयारण्य” बनाने की मांग कर रहे हैं जहां 1000 गाय एक साथ रह सकें। तकनीक भी मदद कर सकती है। हाईवे पर सोलर लाइट, रेडियम पट्टी, RFID टैग। ताकि रात में गाय चमके और ड्राइवर देख ले। जिला कलेक्टर ने आश्वासन दिया है कि 15 दिन में ऑडिट होगा। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होगी। लेकिन लोग कह रहे हैं “आश्वासन तो पहले भी मिले थे।”
जवाबदेही किसकी और हमारी भूमिका क्या हो?
आखिर में सवाल जवाबदेही का है। 1 करोड़ 51 लाख रुपये taxpayer का पैसा है। अगर वो सड़क पर मर रहे गौवंश को नहीं बचा पा रहा तो जिम्मेदार कौन? पहली जवाबदेही जिला प्रशासन की। फंड का उपयोग, मॉनिटरिंग, ऑडिट। दूसरी पंचायत और नगर पालिका की। गौवंश पकड़ना, गौशाला चलाना। तीसरी समाज की। हम गाय को माता कहते हैं लेकिन दूध के बाद सड़क पर छोड़ देते हैं। मीडिया की भूमिका भी है। खबर दिखाना जरूरी है ताकि दबाव बने। लेकिन सिर्फ खबर से काम नहीं चलेगा।
आप क्या कर सकते हैं? अगर आपके क्षेत्र में आवारा गौवंश है तो पंचायत को सूचना दें। गौशाला में जाकर देखें कि पैसा सही लग रहा है या नहीं। RTI लगाकर खर्च का ब्यौरा मांगें। रायसेन-विदिशा हाईवे की ये कहानी सिर्फ एक जिले की नहीं है। ये पूरे मध्य प्रदेश और देश की कहानी है। जहां गौवंश हमारी आस्था है, हमारी अर्थव्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन हमारी प्राथमिकता नहीं। जब तक सरकारी फाइल और जमीनी हकीकत का फासला कम नहीं होगा, तब तक बरेठा से दीवानगंज तक सड़क पर खून के धब्बे दिखते रहेंगे। और हर धब्बे के साथ एक सवाल – 1 करोड़ 51 लाख गए कहां?
अब आपकी बारी। आपकी क्या राय है? कमेंट करके बताइए – गौशालाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अगर गौवंश सुरक्षित नहीं है तो इसके लिए जवाबदेही किसकी होनी चाहिए? प्रशासन की, पंचायत की, या हमारी?