“गोल्ड 10,000 डॉलर तक जाएगा, भारत के स्मॉल-मिडकैप में बड़े मौके: जेफरीज के क्रिस्टोफर वुड का बड़ा बयान”
नई दिल्ली। ग्लोबल निवेश बैंक जेफरीज के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटेजी क्रिस्टोफर वुड ने इस हफ्ते भारतीय बाजार और सोने को लेकर ऐसी भविष्यवाणी की है जिसने निवेशकों का ध्यान खींच लिया है। वुड ने कहा कि सोना अभी कंसोलिडेशन के दौर में है लेकिन लंबी अवधि में इसकी कीमत 10,000 डॉलर प्रति औंस तक जा सकती है। साथ ही उन्होंने कहा कि भारतीय बाजार में इस समय सबसे ज्यादा अवसर स्मॉल और मिडकैप कंपनियों में दिख रहे हैं, लार्जकैप के मुकाबले यहां ग्रोथ की गुंजाइश ज्यादा है।
19 सितंबर 2026 को एक इंटरव्यू में वुड ने अमेरिकी फिस्कल स्थिति, क्रूड ऑयल, वेस्ट एशिया में तनाव, सेमीकंडक्टर सेक्टर में ग्लोबल निवेश और भारत से विदेशी पूंजी निकलने की वजहों पर खुलकर बात की। उनका कहना है कि मौजूदा ग्लोबल अनिश्चितता के बीच भारत की कहानी अभी भी मजबूत है, बस निवेशकों को सही सेगमेंट चुनना होगा।
सोने को लेकर वुड का नजरिया पिछले कई सालों से बुलिश रहा है और इस बार भी उन्होंने उसी लाइन को आगे बढ़ाया है। उनके मुताबिक अमेरिका अपनी मौजूदा फिस्कल स्थिति के कारण ब्याज दरों को बहुत ज्यादा समय तक ऊंचा नहीं रख सकता। अमेरिका पर कर्ज का बोझ इतना ज्यादा है कि अगर ब्याज दरें बहुत ऊपर गईं तो सरकार के लिए ब्याज चुकाना ही मुश्किल हो जाएगा। इसलिए फेड को अंततः दरें घटानी पड़ेंगी और जब दरें घटेंगी तो सोना चमकेगा। वुड ने कहा कि गोल्ड अभी एक कंसोलिडेशन फेज से गुजर रहा है। पिछले कुछ महीनों में कीमतें 2600-2700 डॉलर के आसपास अटकी हुई हैं। लेकिन ये सिर्फ एक ठहराव है। लंबी अवधि की तस्वीर देखें तो सोना कम से कम 10,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकता है। ये आंकड़ा सुनकर बाजार में कई लोगों को झटका लगा क्योंकि अभी गोल्ड 2600 डॉलर के आसपास चल रहा है। मतलब वुड लगभग चार गुना तेजी देख रहे हैं।
उन्होंने निवेशकों को सलाह दी कि जिनके पास अभी गोल्ड नहीं है वो एक्सपोजर लेना शुरू कर सकते हैं और जिनके पास पहले से है वो गिरावट पर और खरीदारी कर सकते हैं। वुड का मानना है कि सोने की ये तेजी सिर्फ निवेशकों के लिए ही अच्छी नहीं है बल्कि भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए भी पॉजिटिव है। भारत में सोना सिर्फ निवेश का जरिया नहीं है, ये कंजम्पशन से भी जुड़ा है। जब सोने की कीमत बढ़ती है तो ग्रामीण और शहरी दोनों परिवारों की नेटवर्थ बढ़ती है और वो खर्च ज्यादा करते हैं। इसलिए गोल्ड की तेजी भारत की कंजम्पशन स्पेंडिंग के लिए भी अच्छा संकेत है।
वुड ने सोने के साथ-साथ सिल्वर और कॉपर पर भी राय दी। उन्होंने सिल्वर को हाई बीटा गोल्ड बताया। मतलब जब सोना बढ़ता है तो सिल्वर उससे भी तेज बढ़ता है और जब गिरता है तो ज्यादा गिरता है। इसलिए रिस्क लेने वाले निवेशक सिल्वर पर नजर रख सकते हैं। कॉपर को लेकर उन्होंने कहा कि इसकी डिमांड अब सिर्फ पारंपरिक इंडस्ट्री से नहीं आ रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर और ग्रीन एनर्जी के इंफ्रास्ट्रक्चर में कॉपर की खपत बहुत बढ़ गई है। इसलिए कॉपर भी पोर्टफोलियो में एक अच्छा रियल एसेट हो सकता है। कुल मिलाकर वुड ने जोर दिया कि आज के समय में पोर्टफोलियो में रियल एसेट्स यानी सोना, चांदी, कॉपर जैसी चीजें होना बहुत जरूरी है क्योंकि पेपर करेंसी और बॉन्ड पर भरोसा कम हो रहा है।
अब बात करते हैं भारतीय शेयर बाजार की। पिछले कुछ महीनों में भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली देखने को मिली है। कई लोगों ने इसे भारत की समस्या माना लेकिन क्रिस्टोफर वुड इससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल भारत से हुई FII बिकवाली का करीब 95 प्रतिशत हिस्सा भारत से जुड़ी किसी दिक्कत की वजह से नहीं था। असली वजह ग्लोबल थी और वो थी सेमीकंडक्टर सेक्टर में आया सबसे बड़ा बूम। वुड ने समझाया कि पिछले एक साल में ताइवान और दक्षिण कोरिया की सेमीकंडक्टर कंपनियों में ग्लोबल फंडों का पैसा बेतहाशा गया है। ये अब तक का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर साइकिल है। AI, चिप्स, डेटा सेंटर की डिमांड इतनी बढ़ गई है कि दुनिया भर के निवेशक अपने पोर्टफोलियो में से पैसा निकालकर सेमीकंडक्टर स्टॉक में डाल रहे हैं। भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम अभी नया है इसलिए ग्लोबल फंड मैनेजरों ने भारत से पैसा निकालकर ताइवान सेमीकंडक्टर, सैमसंग जैसी कंपनियों में लगाया। इसका मतलब ये नहीं है कि भारत की ग्रोथ खराब है। इसका मतलब सिर्फ ये है कि ग्लोबल एलोकेशन में शिफ्ट आया है।
वुड ने कहा कि ये ट्रेंड अस्थायी है। जैसे ही सेमीकंडक्टर साइकिल थोड़ा ठंडा होगा और भारत में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य कंपनियों के प्लांट शुरू होंगे, विदेशी निवेश वापस भारत आएगा। इसलिए भारत से FII की बिकवाली को घबराहट के रूप में नहीं देखना चाहिए।
भारतीय बाजार के अंदर वुड को सबसे ज्यादा दिलचस्पी स्मॉल और मिडकैप सेगमेंट में है। उन्होंने कहा कि पिछले करीब तीन साल में लार्जकैप में कोई नई थीम नहीं दिखी। बैंक, IT, ऑटो जैसी बड़ी कंपनियां तो ठीक हैं लेकिन उनमें वो ग्रोथ नहीं है जो पहले थी। इसके मुकाबले स्मॉल और मिडकैप में कई नई कंपनियां लिस्ट हुई हैं जो डिफेंस, स्पेशलिटी केमिकल, कैपिटल गुड्स, मैन्युफैक्चरिंग और कंज्यूमर में काम कर रही हैं। ये कंपनियां छोटी हैं लेकिन तेज बढ़ रही हैं और वैल्यूएशन भी लार्जकैप के मुकाबले आकर्षक है।वुड के मुताबिक भारत का स्मॉल और मिडकैप मार्केट काफी हेल्दी है। लिक्विडिटी अच्छी है, कॉरपोरेट गवर्नेंस बेहतर हुआ है और प्रमोटर क्वालिटी भी सुधरी है। इसलिए लंबी अवधि में इन शेयरों के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। हालांकि उन्होंने चेतावनी भी दी कि शॉर्ट टर्म में उतार-चढ़ाव आ सकता है। वजह है वेस्ट एशिया में चल रहा तनाव। मिडील ईस्ट में अगर तनाव बढ़ता है तो क्रूड ऑयल की कीमतें ऊपर जाएंगी और उसका असर भारत की महंगाई और कंपनियों की लागत पर पड़ेगा। इसलिए क्रूड ऑयल को वुड ने भारतीय बाजार के लिए सबसे अहम मॉनिटरिंग फैक्टर बताया है। क्रूड के अलावा वुड ने कहा कि आने वाले समय में 3 चीजें भारतीय बाजार तय करेंगी। पहला क्रूड की कीमत, दूसरा ग्लोबल ब्याज दरें और तीसरा FII का फ्लो। अगर क्रूड 80 डॉलर से नीचे रहता है और फेड दरें घटाता है तो भारतीय बाजार के लिए माहौल बहुत अच्छा हो जाएगा। लेकिन अगर वेस्ट एशिया में जंग जैसी स्थिति बनती है और क्रूड 100 डॉलर के पार जाता है तो बाजार में दबाव आएगा।
वुड ने भारत की मैक्रो स्टोरी को अभी भी मजबूत बताया। उन्होंने कहा कि भारत की जीडीपी ग्रोथ, इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च और मैन्युफैक्चरिंग में तेजी ये तीनों फैक्टर 5 से 10 साल की थीम हैं। इसलिए शॉर्ट टर्म की घबराहट को किनारे रखकर लंबी अवधि के निवेशक भारत में बने रह सकते हैं। बस उन्हें सेक्टर चुनते समय स्मार्ट होना होगा। सोने को लेकर उनकी 10,000 डॉलर की भविष्यवाणी ने बाजार में बहस छेड़ दी है। कुछ एक्सपर्ट कह रहे हैं कि ये बहुत ज्यादा है, लेकिन वुड का तर्क है कि जब अमेरिका का कर्ज 35 ट्रिलियन डॉलर के पार है और फिस्कल डेफिसिट लगातार बढ़ रहा है तो करेंसी की कीमत गिरेगी और सोने की कीमत बढ़ेगी। 1970 के दशक में भी ऐसा ही हुआ था जब अमेरिका में फिस्कल संकट था और सोना 35 डॉलर से 800 डॉलर तक गया था। इतिहास खुद को दोहराता है। भारत के लिए इसका मतलब ये है कि घरेलू निवेशकों को गोल्ड ETF और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में पैसा लगाना चाहिए। साथ ही ज्वेलरी कंपनियों के शेयर में भी तेजी आ सकती है क्योंकि ऊंचे दाम पर भी मांग बनी रहती है।
स्मॉल और मिडकैप को लेकर वुड की राय उन फंड मैनेजरों के लिए राहत है जो पिछले एक साल से इस सेगमेंट में पैसा लगा रहे हैं। कई म्यूचुअल फंड हाउस ने स्मॉल कैप फंड में SIP बढ़ाई है और वुड की टिप्पणी से उन्हें और भरोसा मिलेगा। लेकिन रिटेल निवेशक को सावधान भी रहना होगा क्योंकि स्मॉल कैप में वोलेटिलिटी ज्यादा होती है। अंत में वुड ने कहा कि भारत एक लॉन्ग टर्म स्टोरी है। 20 साल पहले चीन था, अब भारत है। डेमोग्राफी, डेमोक्रेसी और डिमांड ये तीन D भारत के साथ हैं। बस निवेशकों को धैर्य रखना होगा और सही सेक्टर में पैसा लगाना होगा। उनका मानना है कि अगले 5 साल में भारत के स्मॉल और मिडकैप से कई मल्टीबैगर निकलेंगे। कुल मिलाकर क्रिस्टोफर वुड का संदेश साफ है। सोना मत बेचो, गिरावट पर खरीदो। भारत में लार्जकैप से ज्यादा स्मॉल-मिडकैप देखो। क्रूड और ग्लोबल घटनाक्रम पर नजर रखो। और सबसे जरूरी, घबराओ मत क्योंकि भारत की ग्रोथ स्टोरी अभी शुरू हुई है।