“MP में महिला सांसद पुरुषों से आगे, सागर की लता वानखेड़े ने खर्च में मारी बाजी, मुरैना के शिवमंगल तोमर सबसे पीछे”
भोपाल। संसद में कानून बनाने के साथ-साथ सांसदों के पास अपने क्षेत्र के विकास के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी भी होती है और वो है सांसद निधि यानी MPLADS का सही इस्तेमाल। हर सांसद को हर साल 5 करोड़ रुपए मिलते हैं ताकि वो अपने क्षेत्र में सड़क, स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक भवन जैसे काम करा सकें। लेकिन जब हिसाब-किताब खोला गया तो मध्य प्रदेश की तस्वीर चौंकाने वाली निकली। प्रदेश के सांसद निधि खर्च करने के मामले में देशभर में 13वें नंबर पर हैं। यानी 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में MP का स्थान 13वां है।
वर्तमान कार्यकाल में अब तक प्रदेश के 40 सांसदों को कुल 592.6 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है। लेकिन इनमें से सिर्फ 239.5 करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए हैं। मतलब कुल आवंटन का सिर्फ 40.4 प्रतिशत। बाकी 353.1 करोड़ रुपए अभी भी खाते में पड़े हैं या स्वीकृति के इंतजार में हैं। ये आंकड़े सरकार के आधिकारिक पोर्टल और संसद के रिकॉर्ड पर आधारित हैं और मौजूदा कार्यकाल के दौरान अब तक हुए कुल आवंटन और खर्च को दिखाते हैं। सबसे दिलचस्प बात जो सामने आई वो ये कि इस खर्च की रेस में प्रदेश की महिला सांसदों ने पुरुष सांसदों को पीछे छोड़ दिया है। आमतौर पर ये माना जाता है कि पुरुष सांसद ज्यादा सक्रिय होते हैं, ज्यादा दौड़-भाग करते हैं, लेकिन MP के आंकड़े कुछ और ही कहानी सुना रहे हैं। प्रदेश की 8 महिला सांसदों ने औसतन करीब 74 प्रतिशत राशि खर्च की है। वहीं 23 पुरुष सांसदों की औसत खर्च दर करीब 65 प्रतिशत रही। यानी महिला सांसद पुरुषों से लगभग 9 प्रतिशत अंक आगे हैं।
इस सूची में सबसे ऊपर नाम है सागर की सांसद डॉ. लता वानखेड़े का। लता वानखेड़े ने अपने कोटे की 99.89 प्रतिशत राशि खर्च कर दी है। मतलब लगभग पूरा पैसा जमीन पर उतर चुका है। उनके क्षेत्र सागर में सांसद निधि से स्कूलों की मरम्मत, सामुदायिक भवन, पेयजल की टंकियां, सोलर लाइट और आंगनवाड़ी भवन जैसे काम हुए हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि लता वानखेड़े खुद हर महीने अपने क्षेत्र का दौरा करती हैं और काम की प्रगति देखती हैं। शायद इसी वजह से उनका खर्च सबसे तेज रहा।
नर्मदापुरम के सांसद दर्शन सिंह चौधरी का प्रदर्शन भी औसत से कम रहा। उन्हें 14.70 करोड़ रुपए मिले थे जिसमें से उन्होंने 47.36 प्रतिशत यानी 6.96 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। ग्वालियर के सांसद भारत सिंह कुशवाह ने 54.82 प्रतिशत राशि खर्च की है। उज्जैन के सांसद अनिल फिरोजिया 68.05 प्रतिशत के साथ मध्यम स्थिति में हैं। देवास के महेंद्र सिंह सोलंकी ने 73.84 प्रतिशत खर्च किया है जो औसत से ऊपर है। खरगोन के गजेंद्र सिंह पटेल ने 14.70 करोड़ में से 11.12 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।
राज्यसभा की बात करें तो यहां भी तस्वीर अलग नहीं है। मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। उनका कार्यकाल 2022 से 2028 तक है और अब तक उन्हें 22.05 करोड़ रुपए मिले थे जिसमें से उन्होंने 18.47 करोड़ यानी 83.75 प्रतिशत खर्च कर दिए हैं। विवेक तन्खा प्रदेश के सभी राज्यसभा सदस्यों में सबसे आगे हैं। उनके बाद डॉ. कविता पाटीदार हैं जिन्होंने 75.54 प्रतिशत राशि खर्च की है। कविता पाटीदार भी 2022 से 2028 तक के कार्यकाल में हैं। वहीं माया नरोलिया जो 2024 में ही राज्यसभा पहुंची हैं उन्होंने भी कम समय में 72.31 प्रतिशत खर्च कर लिया है। उन्हें 14.70 करोड़ मिले थे जिसमें से 10.62 करोड़ का उपयोग हो चुका है। ये आंकड़ा उनके साथ शपथ लेने वाले कई नए सांसदों से बेहतर है। यहां ये बताना जरूरी है कि केंद्रीय मंत्रियों और हाल ही में शपथ लेने वाले 3 नए राज्यसभा सदस्यों को इस तुलना में शामिल नहीं किया गया है। वजह साफ है, मंत्रियों के पास विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है और नए सदस्यों का कार्यकाल अभी शुरू ही हुआ है इसलिए उनके लिए आंकड़े तुलना के लायक नहीं हैं।
अब सवाल उठता है कि सांसद निधि का पैसा खर्च तो हो रहा है लेकिन वो काम कितने टिकाऊ हैं। सरकार ने हाल ही में देशभर में सांसद निधि से बने कामों की जमीनी पड़ताल कराई थी। सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि जितने भी काम चिन्हित किए गए थे वो सभी मौके पर मौजूद मिले। मतलब कागजों में नहीं, जमीन पर काम हुआ है। लेकिन दिक्कत देखभाल की है। सर्वे में पाया गया कि सिर्फ 82 प्रतिशत कामों की ही सही देखभाल हो रही थी। बाकी करीब 18 प्रतिशत काम बदहाली में मिले। यानी हर 20वां काम ऐसा था जो बन तो गया लेकिन अब जर्जर हालत में है या उसका रखरखाव नहीं हो रहा है।
महिला सांसदों के आगे निकलने के पीछे कई वजह मानी जा रही हैं। पहली वजह ये कि महिला सांसद अपने क्षेत्र में ज्यादा फील्ड विजिट करती हैं। दूसरी वजह ये कि उनके पास प्रशासन पर दबाव बनाने का तरीका अलग होता है। तीसरी और सबसे बड़ी वजह ये कि महिला सांसद अक्सर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों पर फोकस करती हैं जहां काम जल्दी शुरू हो जाते हैं। वहीं पुरुष सांसद बड़े प्रोजेक्ट और सड़क जैसे कामों में उलझ जाते हैं जिनमें टेंडर और मंजूरी में समय लगता है।सागर की लता वानखेड़े इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने लगभग पूरा पैसा खर्च कर दिया। उनके क्षेत्र में सांसद निधि से 40 से ज्यादा स्कूलों में शौचालय बने, 25 गांवों में सोलर स्ट्रीट लाइट लगी और 10 सामुदायिक भवन तैयार हुए। लता वानखेड़े खुद बताती हैं कि वो हर महीने समीक्षा बैठक करती हैं और कलेक्टर से सीधे फॉलोअप लेती हैं।
वहीं दूसरी तरफ मुरैना के शिवमंगल सिंह तोमर के क्षेत्र में स्थिति अलग है। यहां सांसद निधि से स्वीकृत कई काम अभी जमीन पर शुरू ही नहीं हुए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन सहयोग नहीं कर रहा और सांसद कार्यालय की तरफ से भी उतनी मॉनिटरिंग नहीं हो रही। शिवमंगल सिंह तोमर का कहना है कि चंबल क्षेत्र में जमीन और वन विभाग की मंजूरी में देरी होती है इसलिए काम धीमा है। भोपाल के आलोक शर्मा चौथे नंबर पर हैं। उन्होंने राजधानी के झुग्गी बस्तियों में पेयजल और सड़क पर खास ध्यान दिया है। आलोक शर्मा का कहना है कि भोपाल स्मार्ट सिटी है इसलिए यहां हर काम की क्वालिटी चेक होती है इसलिए थोड़ा समय लगता है लेकिन काम टिकाऊ होते हैं। इंदौर के शंकर लालवानी का मॉडल सबसे अलग है। उन्होंने अपने कार्यालय में एक अलग MPLADS सेल बना रखी है। हर हफ्ते उस सेल की बैठक होती है और कलेक्टर को रिपोर्ट भेजी जाती है। इसी वजह से इंदौर में 83 प्रतिशत खर्च हो चुका है।
खंडवा के ज्ञानेश्वर पाटिल ने आदिवासी गांवों में आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र पर पैसा लगाया है। उनका मानना है कि सांसद निधि का असली मकसद आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना है। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि बाकी बचे 353 करोड़ रुपए का क्या होगा। अगर इसी गति से खर्च हुआ तो कार्यकाल खत्म होने तक भी पूरा पैसा इस्तेमाल नहीं हो पाएगा। संसद की एक कमेटी ने भी सिफारिश की है कि सांसद निधि के लिए एक तय समय सीमा होनी चाहिए और हर 6 महीने में समीक्षा होनी चाहिए। सरकार ने ये भी कहा है कि जिन सांसदों का खर्च 50 प्रतिशत से कम है उनसे जवाब मांगा जाएगा। मुरैना, नर्मदापुरम और ग्वालियर जैसे जिलों में प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वो सांसदों के साथ बैठकर लंबित प्रस्तावों को जल्दी निपटाएं।
MP की कहानी बताती है कि पैसा है, मंशा भी है लेकिन सिस्टम की धीमी गति और समन्वय की कमी आड़े आ रही है। महिला सांसदों ने साबित किया है कि अगर इच्छाशक्ति हो तो 74 प्रतिशत तक खर्च किया जा सकता है। अब जरूरत है कि पुरुष सांसद भी उनसे सीखें और अपने क्षेत्र में गति लाएं। सागर की लता वानखेड़े टॉप पर हैं, भोपाल के आलोक शर्मा चौथे पर और मुरैना के शिवमंगल तोमर सबसे पीछे। ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं, ये आपके क्षेत्र के विकास की गति बताते हैं। आने वाले 2 साल में देखना होगा कि बाकी सांसद इस लिस्ट में ऊपर आते हैं या नहीं। क्योंकि जनता अंत में काम देखती है, भाषण नहीं।