“राजस्थान निकाय चुनाव: बीजेपी-कांग्रेस के बीच सिर्फ 0.94% का फर्क, 4178 बनाम 3612 वार्ड, दोनों के लिए चुनौतियां ज्यादा जश्न कम”
जयपुर।राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के नतीजे आ गए हैं और तस्वीर बिल्कुल साफ है कि ये चुनाव किसी एक पार्टी के लिए जीत का जश्न मनाने वाला नहीं है। 309 नगर निकायों में दो चरणों में हुई वोटिंग के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं वो हैरान करने वाले हैं।
भाजपा ने 4178 वार्ड जीते हैं। कांग्रेस ने 3612 वार्ड जीते हैं। निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2273 वार्डों पर कब्जा किया है। इसके अलावा 77 पार्षद निर्विरोध चुने गए हैं। वार्ड की संख्या के हिसाब से भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। लेकिन जब वोट प्रतिशत की बात आती है तो कहानी पूरी तरह बदल जाती है। पूरे प्रदेश में भाजपा को 35.18 प्रतिशत वोट मिले हैं और कांग्रेस को 34.24 प्रतिशत वोट मिले हैं। यानी दोनों के बीच का अंतर सिर्फ 0.94 प्रतिशत है। वोटों के अंतर में देखें तो ये फर्क सिर्फ 99,615 वोटों का है। इतना कम अंतर अपने आप में बहुत कुछ कहता है। ये बताता है कि राजस्थान की जनता ने इस बार किसी एक पार्टी को खुलकर मैंडेट नहीं दिया है। मुकाबला बिल्कुल बराबरी का रहा है। इसी वजह से भाजपा भी ज्यादा खुश नहीं दिख रही और कांग्रेस हार के बाद भी उत्साहित है। चुनाव से पहले दोनों पार्टियों ने इसे 2028 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल बताया था। लेकिन नतीजे आने के बाद दोनों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
309 निकायों में दो चरणों में हुआ मतदान
इस बार राजस्थान में 309 नगर निकायों के लिए चुनाव हुए। इसमें 10 नगर निगम, 31 नगर परिषद और 268 नगर पालिकाएं शामिल थीं। चुनाव EVM के जरिए दो चरणों में कराए गए। पहले चरण में 150 और दूसरे चरण में 159 निकायों में वोटिंग हुई। कुल 10,140 वार्डों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें से 77 वार्डों पर उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए थे इसलिए 10,063 वार्डों पर वोटिंग हुई। मतदान प्रतिशत भी अच्छा रहा। शहरी मतदाताओं ने बड़ी संख्या में वोट डाले। महिला मतदाताओं की भागीदारी भी पिछली बार से ज्यादा रही।
आंकड़ों की कहानी: 4178 बनाम 3612 और 0.94% का अंतर
नतीजे आने के बाद सबसे पहले वार्ड की संख्या देखी गई।
भाजपा: 4178 वार्ड
कांग्रेस: 3612 वार्ड
निर्दलीय: 2273 वार्ड
अन्य: 140 वार्ड
निर्विरोध: 77 वार्ड
वार्ड में भाजपा 566 वार्ड से आगे है। इसलिए मीडिया और भाजपा ने इसे “भाजपा की जीत” बताया। लेकिन जब वोट प्रतिशत निकाला गया तो तस्वीर पलट गई।
भाजपा: 35.18%
कांग्रेस: 34.24%
निर्दलीय + अन्य: 30.58%
दोनों के बीच सिर्फ 0.94% का अंतर। वोटों के अंतर में ये सिर्फ 99,615 वोट हैं। यानी अगर 1 लाख वोट इधर-उधर हो जाते तो नतीजा उल्टा हो सकता था। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजस्थान में इतना करीबी निकाय चुनाव पिछले 20 साल में नहीं हुआ। 2014 में भाजपा को 12% की बढ़त थी। 2019 में कांग्रेस 8% आगे थी। लेकिन 2026 में दोनों बिल्कुल बराबर पर आ गए।
बड़े शहरों में भाजपा का दबदबा, छोटे शहरों में कांग्रेस और निर्दलीय
अगर शहरों के हिसाब से देखें तो पैटर्न साफ दिखता है।
बड़े नगर निगम: जयपुर, कोटा, उदयपुर, भीलवाड़ा में भाजपा ने बाजी मारी।
जयपुर नगर निगम में भाजपा ने 100 में से 62 सीटें जीतीं। मेयर भी भाजपा का बनेगा। कोटा में भाजपा ने 70 में से 41 सीटें जीतीं। उदयपुर में 60 में से 35 और भीलवाड़ा में 50 में से 28 सीटें भाजपा के खाते में गईं। भाजपा नेताओं का कहना है “शहरी मतदाता विकास और मोदी के नाम पर भाजपा के साथ है।”
छोटे शहर और नगर पालिकाएं: यहां कहानी अलग है। अजमेर, भरतपुर, अलवर, बीकानेर जैसी जगहों पर कांग्रेस ने वापसी की। कई जगह निर्दलीय उम्मीदवारों ने दोनों पार्टियों को हराया। उदाहरण के लिए सीकर में 45 में से 20 सीटें निर्दलीय जीते। चूरू में कांग्रेस और निर्दलीय मिलकर भाजपा से आगे निकल गए। कांग्रेस नेताओं का कहना है “छोटे शहरों में महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा हावी रहा। जनता ने स्थानीय मुद्दों पर वोट दिया।”
निर्दलीयों की बड़ी भूमिका
इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी निर्दलीय उम्मीदवार हैं। 2273 वार्ड निर्दलीयों ने जीते हैं। ये कुल वार्ड का 22.5% है। कई नगर पालिकाओं में अब किसी भी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। ऐसे में मेयर, चेयरमैन चुनने के लिए निर्दलीयों की जरूरत पड़ेगी। राजनीतिक गलियारों में इसे “किंगमेकर” कहा जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों निर्दलीयों को तोड़ने की कोशिश में लगी हैं।
उदाहरण: टोंक नगर पालिका में कुल 45 वार्ड। भाजपा 16, कांग्रेस 14, निर्दलीय 15। अब चेयरमैन कौन बनेगा ये निर्दलीय तय करेंगे।
कांग्रेस हारकर भी उत्साहित क्यों
कांग्रेस हारकर भी उत्साहित क्यों
कांग्रेस 566 वार्ड से पीछे है। लेकिन पार्टी में मायूसी नहीं है।
पहला कारण: वोट प्रतिशत में अंतर सिर्फ 0.94%। कांग्रेस नेताओं का कहना है “हम बराबरी पर हैं। 1 लाख वोट का खेल है।”
दूसरा कारण: बड़े शहर छोड़कर बाकी जगह टक्कर। अजमेर, भरतपुर, पाली में कांग्रेस ने अच्छा किया।
तीसरा कारण: निर्दलीय फैक्टर। कांग्रेस को उम्मीद है कि कई निर्दलीय उनके साथ आएंगे।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा “ये जनादेश किसी के खिलाफ नहीं है। जनता ने दोनों को बराबर रखा है। हम जमीनी मुद्दों पर लड़ेंगे।”
2028 विधानसभा का सेमीफाइनल था, अब क्या संदेश
चुनाव से पहले दोनों पार्टियों ने कहा था कि ये 2028 का सेमीफाइनल है। नतीजे के बाद संदेश साफ है।
पहला संदेश: राजस्थान में कोई लहर नहीं है। न मोदी लहर, न गहलोत लहर। मुकाबला व्यक्ति और स्थानीय मुद्दों पर है।
दूसरा संदेश: शहरी वोटर भाजपा के साथ, कस्बाई वोटर बंटा हुआ। 2028 में जिसने कस्बों को साधा वो जीतेगा।
तीसरा संदेश: निर्दलीय और छोटे दलों की भूमिका बढ़ेगी। अब सिर्फ पार्टी सिंबल से चुनाव नहीं जीता जा सकता।
आगे क्या होगा, मेयर और चेयरमैन का चुनाव
अब सबसे बड़ा खेल मेयर और चेयरमैन चुनाव का होगा। नियम के अनुसार पार्षद आपस में मेयर चुनेंगे। जयपुर, कोटा, उदयपुर, भीलवाड़ा में भाजपा के पास बहुमत है इसलिए वहां भाजपा का मेयर तय है। लेकिन 200 से ज्यादा नगर पालिकाओं में त्रिशंकु स्थिति है। वहां अगले 15 दिन तक तोड़-जोड़ चलेगी। भाजपा और कांग्रेस दोनों दिल्ली और जयपुर से पर्यवेक्षक भेज रहे हैं। राजनीतिक जानकार कहते हैं “ये 15 दिन राजस्थान की राजनीति तय करेंगे।”
जनता ने क्या संदेश दिया
चुनाव विश्लेषक डॉ. नरेंद्र शर्मा कहते हैं “जनता ने कहा है कि हम नाराज भी हैं और उम्मीद भी है। महंगाई, पानी, सफाई, अतिक्रमण जैसे मुद्दे हावी रहे।” एक वोटर ने जयपुर में कहा “हमने भाजपा को निगम दिया क्योंकि सड़क ठीक चाहिए। लेकिन पालिका में कांग्रेस को वोट दिया क्योंकि वहां के पार्षद काम करते हैं।” यानी वोटर अब स्मार्ट हो गया है। वो पार्टी नहीं, काम देख रहा है।
राजस्थान निकाय चुनाव 2026 का नतीजा एक लाइन में कहा जाए तो “जीत भी नहीं, हार भी नहीं।” भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है लेकिन वोट प्रतिशत में बढ़त नहीं। कांग्रेस सीट में पीछे है लेकिन वोट में बराबरी पर। निर्दलीय सबसे बड़े किंगमेकर बन गए हैं। 0.94% का अंतर बताता है कि राजस्थान में अगला विधानसभा चुनाव बहुत कांटे का होगा। अब दोनों पार्टियों के पास 2 साल हैं। भाजपा को वोट प्रतिशत बढ़ाना है। कांग्रेस को सीट को वोट में बदलना है। और जनता? जनता देख रही है कि मेयर और चेयरमैन बनने के बाद पार्षद उनके गली-मोहल्ले की समस्या कब सुलझाते हैं। फिलहाल जश्न कम, चुनौतियां ज्यादा।