तुर्की-पाकिस्तान के दुरी बनाने से सऊदी बैकफुट पर, इलरायल ने लपका मौका- क्या अब्राहम अकोर्ड का रास्ता खुलेगा?
2026 की शुरुआत में हूतियों ने जेद्दा, रियाद और अबहा एयरपोर्ट पर 3 बड़े हमले किए। सऊदी के पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम कुछ हमले रोक पाया, लेकिन कई ड्रोन अंदर घुस गए। इससे सऊदी के अंदर ये सवाल उठने लगा कि 10 साल से चल रही ‘ऑपरेशन डेसीसिव स्टॉर्म’ के बाद भी हूती खत्म क्यों नहीं हुए? सऊदी अरब ने 2015 में गठबंधन बनाकर यमन में हस्तक्षेप किया था। साथ में UAE, बहरीन, मिस्र थे। लेकिन 2024-25 में UAE ने धीरे-धीरे अपनी फौजें वापस ले लीं। अब सऊदी अकेला लड़ रहा है और खर्चा भी उसी के पास है। अनुमान है कि अब तक सऊदी इस जंग पर 200 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च कर चुका है।
यमन में हूतियों के हमले से सऊदी की मुश्किलें क्यों बढ़ीं? पूरा बैकग्राउंड
यमन में 2014 से चल रही जंग ने अब सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है। हूती विद्रोही, जिन्हें ईरान का समर्थन हासिल है, पिछले 1 साल में सऊदी के तेल ठिकानों, एयरपोर्ट और बॉर्डर इलाकों पर ड्रोन और मिसाइल हमले लगातार बढ़ा दिए हैं।इसी बीच हूतियों ने लाल सागर में शिपिंग पर भी हमले शुरू कर दिए। बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल के टैंकर निशाना बने। इससे सऊदी की इकॉनमी पर सीधा असर पड़ा क्योंकि सऊदी का 60% तेल निर्यात इसी रास्ते से जाता है। यही वो समय है जब सऊदी को एहसास हुआ कि सिर्फ हवाई हमले से हूती नहीं रुकेंगे। ग्राउंड इंटेलिजेंस, साइबर वारफेयर और मिसाइल डिफेंस में नई टेक्नोलॉजी चाहिए। और यहीं से इजरायल की एंट्री की कहानी शुरू होती है।
मक्का डिफेंस पैक्ट फेल? तुर्की और पाकिस्तान ने क्यों छोड़ा सऊदी का साथ
2025 में सऊदी अरब ने तुर्की और पाकिस्तान के साथ मिलकर “मक्का डिफेंस पैक्ट” का ऐलान किया था। इसका मकसद था – मुस्लिम देशों का एक सैन्य गठबंधन जो क्षेत्रीय खतरों से निपटे। लेकिन यमन जंग में जब सऊदी को असल मदद चाहिए थी, तब तुर्की और पाकिस्तान दोनों ने दूरी बना ली।
तुर्की क्यों पीछे हटा? राष्ट्रपति एर्दोगन ईरान से सीधा टकराव नहीं चाहते। तुर्की के सीरिया और इराक में अपने फ्रंट खुले हैं। साथ ही तुर्की हूतियों को “यमनी जनता का आंदोलन” बताकर खुलकर सऊदी के खिलाफ नहीं जाना चाहता। इजरायली चैनल i24NEWS के डिप्लोमैटिक कॉरेस्पोंडेंट गाइ एजरील ने एक सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा – “एर्दोगन का डिफेंस पैक्ट उस कागज के टुकड़े के बराबर भी नहीं है जिस पर वो लिखा है।”
पाकिस्तान क्यों चुप है? पाकिस्तान की फौज पहले से ही आतंकवाद और अफगानिस्तान बॉर्डर में उलझी है। साथ ही पाकिस्तान ईरान से भी 900 KM की सीमा साझा करता है। सऊदी की मदद करने का मतलब ईरान को नाराज करना। इसलिए पाकिस्तान ने “नैतिक समर्थन” के अलावा कुछ नहीं दिया। नतीजा क्या हुआ| सऊदी को लगा कि मुस्लिम भाईचारे वाला गठबंधन कागज पर ही रह गया। जमीन पर मदद के लिए कोई नहीं आया। इसी खालीपन को इजरायल भरना चाहता है।
इजरायल-सऊदी का सीक्रेट इंटेलिजेंस सहयोग – अमेरिका की मध्यस्थता
रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2026 में अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और सऊदी अरब के बीच सीक्रेट इंटेलिजेंस शेयरिंग शुरू हुई।एक इजरायली सुरक्षा अधिकारी ने कहा – “आपने मदद मांगी और इजरायल जानता था कि मदद कैसे करनी है। आपको पता होना चाहिए कि आपके दोस्त कौन हैं।” ये सहयोग खुलकर सामने नहीं आया क्योंकि सऊदी अभी भी फिलिस्तीन मुद्दे की वजह से इजरायल से औपचारिक संबंध नहीं बना सकता। लेकिन पर्दे के पीछे दोनों की टीमें वॉशिंगटन में मिल रही हैं। अमेरिका इसके पीछे है क्योंकि अमेरिका चाहता है कि ईरान के खिलाफ एक मजबूत सुन्नी-इजरायल ब्लॉक बने। बाइडेन प्रशासन के बाद ट्रंप 2.0 भी इसी लाइन पर है।
क्षेत्रीय असर – ईरान, अमेरिका और भारत पर क्या पड़ेगा?
इस पूरे घटनाक्रम का असर सिर्फ सऊदी-इजरायल तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान पर असर: अगर सऊदी-इजरायल करीब आते हैं तो ईरान दो फ्रंट पर घिर जाएगा। एक तरफ इजरायल, दूसरी तरफ सऊदी। ईरान हूतियों को और हथियार दे सकता है। अमेरिका पर असर: अमेरिका चाहता है कि मध्य-पूर्व में उसकी जिम्मेदारी कम हो। सऊदी-इजरायल गठबंधन से अमेरिका को फायदा होगा। भारत पर असर: भारत के लिए ये डेलिकेट है।
– भारत के सऊदी और UAE से 8 करोड़ भारतीयों का रिश्ता है
– इजरायल से डिफेंस और टेक का रिश्ता है
– ईरान से चाबहार पोर्ट का रिश्ता है
भारत चाहेगा कि क्षेत्र में स्थिरता रहे और तेल की सप्लाई न रुके।
इजरायल इसे ‘सुनहरा मौका’ क्यों मान रहा है?
इजरायली एक्सपर्ट्स के लिए ये सिर्फ सैन्य मदद नहीं, डिप्लोमैटिक ब्रेकथ्रू का मौका है। सऊदी को अपनी ताकत दिखाना इजरायल ये साबित करना चाहता है कि “जब संकट आए तो तुर्की नहीं, इजरायल काम आता है”। हूतियों के मिसाइल को रोकने में इजरायल का टेक्नोलॉजी सऊदी से बेहतर है।
ईरान को काउंटर करना इजरायल और सऊदी दोनों ईरान को अपना सबसे बड़ा खतरा मानते हैं। हूती = ईरान का प्रॉक्सी। अगर सऊदी-इजरायल मिलकर हूती को हराते हैं तो ईरान का मैसेज कमजोर होगा।
अब्राहम अकॉर्ड का रास्ता खोलना 2020 में UAE, बहरीन, मोरक्को ने इजरायल से संबंध जोड़े थे। सऊदी सबसे बड़ा नाम बचा है। इजरायल चाहता है कि सऊदी ये देखे कि सुरक्षा के लिए इजरायल सबसे भरोसेमंद पार्टनर है। फिर धार्मिक और आर्थिक रिश्ते अपने आप बन जाएंगे।