नाना पाटेकर जी का हुआ निधन! प्रमुख हस्तियों ने जताया शोक, फैंस हुए परेशान
नाना पाटेकर हमारे समय के सबसे दमदार अभिनेताओं में से एक हैं और उनके फैंस के लिए ऐसी कोई भी खबर बहुत तकलीफदेह होती है। यह खबर गुरुवार, 08 अक्टूबर 2026 की सुबह सामने आई और देखते ही देखते पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। जिस अभिनेता की दमदार आवाज, अलग अंदाज और जबरदस्त अभिनय ने कई दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया, उनके अचानक चले जाने की खबर ने करोड़ों फैंस को झकझोर कर रख दिया है। 75 साल की उम्र में नाना पाटेकर का निधन कार्डियक अरेस्ट के बाद हुआ। वह गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर पर बेहोशी की हालत में मिले थे। इसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। अस्पताल की ओर से बताया गया कि उन्हें करीब 45 मिनट तक सीपीआर और कार्डियक मसाज दी गई, लेकिन उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सका। उन्हें सुबह करीब 5:20 बजे मृत घोषित किया गया।
आखिर निधन की पुष्टि किसने की?
नाना पाटेकर के निधन की पुष्टि उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने भी की है। खबर सामने आने के बाद फिल्म इंडस्ट्री से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हर तरफ शोक की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। जिन लोगों ने नाना के साथ काम किया, जिन लोगों ने उनके अभिनय को करीब से देखा और जिन दर्शकों ने उन्हें पर्दे पर पसंद किया, सभी के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं है। नाना पाटेकर उन कलाकारों में शामिल थे जिनके अभिनय को देखने के लिए सिर्फ स्टारडम की जरूरत नहीं पड़ती थी। वह पर्दे पर आते थे तो दर्शकों का ध्यान अपने आप उनकी तरफ चला जाता था। उनकी आवाज में एक अलग तरह की कशिश थी, उनकी आंखों में एक अलग तरह की गहराई थी और संवाद बोलने का अंदाज ऐसा था जिसे कोई दूसरा अभिनेता आसानी से दोहरा नहीं सकता था।
नाना पाटेकर आखिर कोन थे?
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। एक सामान्य परिवार से निकलकर उन्होंने जिस तरह भारतीय सिनेमा में अपनी पहचान बनाई, वह अपने आप में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। नाना ने सिर्फ अभिनेता बनने का सपना नहीं देखा बल्कि इसके लिए संघर्ष भी किया। थिएटर से शुरुआत करने वाले नाना ने धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई और फिर हिंदी और मराठी सिनेमा के उन कलाकारों में शामिल हो गए जिनके नाम के साथ अभिनय की एक अलग पहचान जुड़ गई।
नाना पाटेकर ने फिल्मे सिनेमा में पहला कदम
नाना पाटेकर ने साल 1978 में आई फिल्म ‘गमन’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा था। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह कलाकार आने वाले वर्षों में भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में से एक बनेगा। शुरुआत आसान नहीं थी। फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाना और फिर उस जगह को बनाए रखना किसी भी कलाकार के लिए मुश्किल होता है, लेकिन नाना ने अपनी मेहनत, प्रतिभा और अलग तरह की अभिनय शैली के दम पर यह मुकाम हासिल किया। उन्होंने मराठी फिल्मों और थिएटर में भी काम किया और धीरे-धीरे उनका नाम गंभीर और प्रभावशाली अभिनेताओं के तौर पर स्थापित होने लगा।
नाना पाटेकर का अभिनय दूसरे कलाकारों से इसलिए भी अलग था क्योंकि वह किसी किरदार को सिर्फ निभाते नहीं थे बल्कि उसे अपने भीतर उतार लेते थे। उनके चेहरे के भाव, उनकी आवाज, उनका चलने का अंदाज और उनके संवाद बोलने की गति तक किरदार के हिसाब से बदल जाती थी। वह किसी भी भूमिका में खुद को इस तरह ढाल लेते थे कि दर्शक कुछ समय के लिए यह भूल जाता था कि वह पर्दे पर नाना पाटेकर को देख रहा है। वह किरदार ही बन जाते थे।साल 1988 में मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे!’ ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। इस फिल्म ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई और इसके बाद उनके अभिनय को लेकर लोगों की नजरें उन पर टिकने लगीं। इसके अगले ही साल 1989 में आई ‘परिंदा’ ने उनके करियर को एक नई ऊंचाई दी। विधु विनोद चोपड़ा की इस फिल्म में नाना ने एक गैंगस्टर का किरदार निभाया था। यह भूमिका इतनी प्रभावशाली थी कि आज भी ‘परिंदा’ और नाना पाटेकर का नाम एक साथ लिया जाता है। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
‘परिंदा’ के बाद नाना के पास एक के बाद एक शानदार किरदार आने लगे। उन्होंने ऐसे किरदार किए जिनमें गुस्सा था, दर्द था, संघर्ष था, जुनून था और कहीं न कहीं इंसानी कमजोरी भी थी। नाना की खासियत यह थी कि वह विलेन के किरदार को भी सिर्फ विलेन बनाकर नहीं छोड़ते थे। वह उस किरदार के पीछे की मानसिकता को समझते थे और उसे पर्दे पर इस तरह दिखाते थे कि दर्शक उससे नफरत करने के साथ-साथ उसके चरित्र को समझने की कोशिश भी करता था।साल 1991 में नाना पाटेकर ने निर्देशन की दुनिया में भी कदम रखा और ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ बनाई। यह फिल्म सेना और सैनिकों की जिंदगी के इर्द-गिर्द थी। नाना का सेना से जुड़ाव सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण लिया और भारतीय सेना के साथ भी उनका जुड़ाव रहा। कारगिल युद्ध के दौरान भी उनके सेना के साथ समय बिताने और सैनिकों के बीच जाने की बातें सामने आती रही हैं। यही वजह है कि देशभक्ति से जुड़े किरदारों में भी उनका अंदाज अलग दिखाई देता था।
इसके बाद साल 1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हो गई। इस फिल्म में उन्होंने प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया था। यह किरदार गुस्से, देशभक्ति, सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज और आम आदमी की पीड़ा का मिश्रण था। नाना ने इस भूमिका को जिस तरह निभाया, वह आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार अभिनय में गिना जाता है। ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला। फिल्मफेयर पुरस्कार भी उन्हें मिला।
नाना पाटेकर की आवाज की क्यों थी वाह-वाही?
नाना की आवाज उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकतों में से एक थी। जब वह किसी किरदार के संवाद बोलते थे तो ऐसा लगता था कि शब्द सिर्फ बोले नहीं जा रहे बल्कि सीधे दर्शक के दिल तक पहुंच रहे हैं। उनके संवादों में एक खास तरह का गुस्सा और सच्चाई होती थी। यही वजह है कि उनके कई संवाद लोगों की जुबान पर चढ़ गए। वह चाहे गंभीर भूमिका निभा रहे हों या किसी हास्य किरदार में हों, उनकी आवाज और संवाद अदायगी हमेशा अलग नजर आती थी।
साल 1996 में नाना पाटेकर ने ‘अग्नि साक्षी’ में ऐसा किरदार निभाया जिसने दर्शकों को अंदर तक हिला दिया। इस फिल्म में उन्होंने एक बेहद खतरनाक और मानसिक रूप से परेशान व्यक्ति का किरदार निभाया था। उनकी अदाकारी इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शकों के लिए यह समझना मुश्किल हो गया कि यह वही अभिनेता है जिसने ‘क्रांतिवीर’ जैसे किरदार को निभाया था। ‘अग्नि साक्षी’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस तरह नाना पाटेकर उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हो गए जिन्होंने अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किए।
नाना पाटेकर जी का करियर कैसा रहा?
नाना पाटेकर का करियर सिर्फ गंभीर और गुस्सैल किरदारों तक सीमित नहीं था। उन्होंने कॉमेडी में भी ऐसा रंग दिखाया जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। साल 2007 में आई ‘वेलकम’ में उन्होंने उदय शेट्टी का किरदार निभाया। यह किरदार एक गैंगस्टर का था, लेकिन फिल्म में उसके अंदर का हास्य और अजीब परिस्थितियों में फंसने वाला अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया। उदय शेट्टी का किरदार नाना के करियर के सबसे लोकप्रिय किरदारों में से एक बन गया। जिस अभिनेता को लोग ‘क्रांतिवीर’ और ‘परिंदा’ जैसी गंभीर फिल्मों में देखते आए थे, वही अभिनेता ‘वेलकम’ में अपनी कॉमेडी से लोगों को हंसाता नजर आया। यही उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी।‘वेलकम’ के बाद नाना की लोकप्रियता एक नई पीढ़ी के बीच भी बढ़ गई। बहुत से ऐसे दर्शक जिन्होंने उनकी पुरानी फिल्में नहीं देखी थीं, वे भी उन्हें उदय शेट्टी के नाम से पहचानने लगे। उनकी संवाद अदायगी, चेहरे के भाव और अनिल कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने फिल्म को अलग ही रंग दिया। बाद में ‘वेलकम बैक’ में भी उन्होंने इसी किरदार को दोबारा निभाया।
नाना पाटेकर ने कोनसी फिल्मे की
नाना पाटेकर ने ‘अभिनेता’ शब्द को सिर्फ पर्दे पर निभाई जाने वाली भूमिका तक सीमित नहीं रखा। वह लेखक भी रहे, निर्देशक भी रहे और थिएटर से उनका गहरा रिश्ता रहा। उनका मानना था कि अभिनय सिर्फ चेहरा दिखाने का काम नहीं है बल्कि यह इंसान के भीतर छिपी भावनाओं को बाहर लाने की कला है। शायद यही वजह थी कि वह अपने किरदारों को लेकर बहुत गंभीर रहते थे।
उनके करियर में ‘अंगार’, ‘तिरंगा’, ‘राजू बन गया जेंटलमैन’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘शक्ति: द पावर’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘टैक्सी नंबर 9211’ और ‘नटसम्राट’ जैसी कई फिल्में शामिल हैं। हर फिल्म में उनका अंदाज अलग रहा। कहीं वह पुलिस अधिकारी बने, कहीं अपराधी, कहीं नेता, कहीं आम आदमी, कहीं पिता और कहीं ऐसा व्यक्ति जो अपने भीतर की लड़ाई लड़ रहा था।
यही वजह है कि नाना के किरदारों से लोग जुड़ जाते थे। वह हमेशा अच्छे इंसान का किरदार नहीं निभाते थे। कई बार वह बेहद खतरनाक किरदार निभाते थे। लेकिन उनके अभिनय की ईमानदारी के कारण दर्शक उस किरदार को भूल नहीं पाता था।
उनकी संवाद अदायगी की नकल कई लोगों ने की, लेकिन नाना जैसा असर पैदा करना आसान नहीं था। उनकी आवाज में जो भारीपन था, वह किसी तकनीक से नहीं आता था। वह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। जब वह गुस्से में संवाद बोलते थे तो स्क्रीन का माहौल बदल जाता था। जब वह भावुक होते थे तो वही आवाज दर्द पैदा करती थी। और जब वह कॉमेडी करते थे तो उसी आवाज में हास्य का अलग रंग दिखाई देता था।