ग्लोबल साउथ की आवाज है भारत: V4 देशों ने UNSC में स्थायी सदस्यता के लिए दिया समर्थन 8 बार अस्थायी सदस्य रहा भारत
नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की तीन दशक लंबी मांग को अब यूरोप से बड़ा समर्थन मिल गया है। चेक रिपब्लिक, स्लोवाकिया, हंगरी और पोलैंड यानी V4 समूह के चारों देशों ने एक सुर में कहा है कि भारत इंडो-पैसिफिक का उभरता हुआ सुपरपावर है और उसे UNSC में स्थायी सीट के साथ वीटो पावर भी मिलनी चाहिए।
स्लोवाकिया के विदेश मंत्री जुराज ब्लानर ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में ये ऐलान किया। उन्होंने कहा “भारत ग्लोबल साउथ की आवाज है। 21वीं सदी की दुनिया में भारत के बिना सुरक्षा परिषद अधूरी है। हम V4 के सभी सदस्य भारत के स्थायी सदस्यता के दावे का पूरा समर्थन करते हैं।” भारत अब तक 8 बार UNSC का अस्थायी सदस्य रह चुका है। हर बार भारत ने शांति, विकास और बहुपक्षवाद की बात की है। लेकिन स्थायी सीट न होने की वजह से बड़े फैसलों में भारत की भूमिका सीमित रह जाती है। अब V4 के समर्थन के बाद भारत की दावेदारी और मजबूत हो गई है।
V4 देशों ने क्या कहा, स्लोवाकिया के विदेश मंत्री का बयान
संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान स्लोवाकिया के विदेश मंत्री जुराज ब्लानर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा “दुनिया बदल गई है। 1945 में बनी सुरक्षा परिषद आज की हकीकत नहीं दिखाती। भारत 1.4 अरब लोगों का देश है। वो दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी इकॉनमी है। वो 150 से ज्यादा देशों को वैक्सीन, दवा और अनाज दे चुका है। ऐसे देश को बाहर रखना अन्याय है।”
उन्होंने आगे कहा “V4 यानी चेक रिपब्लिक, स्लोवाकिया, हंगरी और पोलैंड सभी इस बात पर सहमत हैं कि भारत को स्थायी सदस्य बनाया जाए। और सिर्फ सदस्य नहीं, उसे वीटो पावर भी मिलनी चाहिए। क्योंकि बिना वीटो के स्थायी सदस्यता अधूरी है।” ब्लानर ने भारत की विदेश नीति की तारीफ की। कहा “भारत रूस-यूक्रेन युद्ध में शांति की बात करता है। इजरायल-हमास में मानवीय मदद भेजता है। अफ्रीका में विकास प्रोजेक्ट चलाता है। ये ग्लोबल साउथ की लीडरशिप है।” चेक रिपब्लिक, हंगरी और पोलैंड के राजदूतों ने भी ब्लानर के बयान का समर्थन किया। पोलैंड के राजदूत ने कहा “हम यूरोप से हैं। लेकिन हम जानते हैं कि एशिया के बिना दुनिया नहीं चल सकती। भारत को अंदर लाना होगा।”
भारत की 30 साल पुरानी मांग और 8 बार अस्थायी सदस्यता
भारत 1945 से ही संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है। लेकिन सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट आज भी 5 देशों P5 यानी अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस के पास है। भारत 1992 से G4 समूह यानी जापान, जर्मनी और ब्राजील के साथ मिलकर स्थायी सीट की मांग कर रहा है। भारत का तर्क है कि दुनिया की आबादी का 17% भारत में है। दुनिया की सबसे बड़ी सेना भारत के पास है। भारत 60 साल से ज्यादा समय से UN शांति मिशन में सैनिक भेज रहा है।
भारत अब तक 8 बार UNSC का अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है। आखिरी बार 2021-2022 में। हर बार भारत ने आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाई। कोविड के समय वैक्सीन मैत्री चलाई। जलवायु परिवर्तन और साइबर सुरक्षा जैसे नए मुद्दे उठाए। लेकिन अस्थायी सदस्य होने की वजह से भारत के पास वीटो पावर नहीं है। यानी अगर P5 में से कोई एक देश किसी प्रस्ताव पर वीटो कर दे तो भारत कुछ नहीं कर सकता। इसी वजह से भारत कहता है “हमें स्थायी सीट चाहिए, और वीटो के साथ चाहिए।”
V4 का समर्थन क्यों अहम है
V4 यानी विसेग्राद समूह यूरोप के 4 मध्य यूरोपीय देश हैं। ये यूरोपीय संघ और NATO दोनों के सदस्य हैं। इनकी आवाज यूरोप में सुनी जाती है। अब तक भारत को अमेरिका, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और जर्मनी का समर्थन मिला हुआ था। लेकिन पूर्वी यूरोप के देशों का समर्थन नया है। इसका मतलब है कि अब यूरोप के अंदर भी भारत के लिए सहमति बन रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि V4 का समर्थन 3 कारणों से अहम है।
पहला: ये देश रूस और चीन दोनों से दूरी बनाकर रखते हैं। इसलिए उनका समर्थन “गुट निरपेक्ष” माना जाएगा।
दूसरा: ये देश खुद छोटे हैं। इसलिए वो बड़े देशों के एकाधिकार के खिलाफ हैं। वो चाहते हैं कि UNSC में नए देशों को जगह मिले।
तीसरा: भारत इन देशों के साथ डिफेंस, टेक्नोलॉजी और ट्रेड बढ़ा रहा है। पोलैंड से हथियार, चेक से मशीनरी, हंगरी से फार्मा। इसलिए रिश्ते मजबूत हैं।
विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा “V4 का समर्थन दिखाता है कि भारत की कूटनीति काम कर रही है। हम सिर्फ बड़े देशों पर निर्भर नहीं हैं।”
भारत को स्थायी सीट क्यों मिलनी चाहिए, 5 बड़े कारण
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर कई बार कह चुके हैं कि 21वीं सदी की UNSC 20वीं सदी जैसी नहीं हो सकती। भारत के दावे के पीछे 5 बड़े कारण हैं।
पहला कारण: आबादी और लोकतंत्र
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। 1.4 अरब लोग। दुनिया की 6 में से 1 व्यक्ति भारतीय है। अगर UNSC दुनिया का प्रतिनिधित्व करती है तो भारत को बाहर कैसे रखा जा सकता है।
दूसरा कारण: आर्थिक ताकत
भारत 2024 में दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी इकॉनमी बन गया। 2030 तक तीसरी बनने का अनुमान है। भारत की कंपनियां, स्टार्टअप और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी दुनिया में रोल मॉडल है। UPI, कोविन, आधार को 40 देश अपना रहे हैं।
तीसरा कारण: शांति और सुरक्षा में योगदान
भारत UN शांति मिशन में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में से एक है। 60 साल में 250 से ज्यादा भारतीय सैनिक शांति मिशन में शहीद हुए हैं। भारत हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा देता है। आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलता है।
चौथा कारण: ग्लोबल साउथ की आवाज
कोविड के समय भारत ने 100 से ज्यादा देशों को वैक्सीन भेजी। श्रीलंका, मालदीव, अफ्रीका में फ्री में दवा और अनाज भेजा। G20 की अध्यक्षता में भारत ने “ग्लोबल साउथ” को मेनस्ट्रीम में लाया। अफ्रीकन यूनियन को G20 का सदस्य बनवाया। दुनिया भारत को ग्लोबल साउथ का नेता मानती है।
पांचवां कारण: संतुलन
आज UNSC में P5 में 3 पश्चिमी देश और 2 एशियाई देश हैं। एशिया की आबादी 60% है लेकिन प्रतिनिधित्व 40%। भारत के आने से एशिया और ग्लोबल साउथ को बराबर आवाज मिलेगी।
चीन और पाकिस्तान क्या कह रहे हैं
भारत की दावेदारी के सबसे बड़े विरोधी चीन और पाकिस्तान हैं। चीन का कहना है “भारत को समर्थन है लेकिन अभी समय नहीं आया।” असल में चीन नहीं चाहता कि एशिया में भारत की ताकत बढ़े। चीन खुद वीटो पावर रखता है और भारत के प्रस्तावों को कई बार ब्लॉक कर चुका है। पाकिस्तान ने कहा “भारत को सीट नहीं मिलनी चाहिए। कश्मीर मुद्दा है।” लेकिन दुनिया अब पाकिस्तान की बात नहीं सुनती। V4 के समर्थन के बाद चीन पर दबाव बढ़ेगा। क्योंकि अगर यूरोप के 4 देश, अमेरिका, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन सब हां कहेंगे तो चीन अकेला पड़ जाएगा।
भारत की आगे की रणनीति क्या है
विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा है कि भारत “सुधार या बाहर” की नीति पर है। यानी या तो UNSC में सुधार हो, या भारत वैकल्पिक मंच बनाएगा। भारत की 3 लाइन की रणनीति है।
पहली: G4 के साथ मिलकर दबाव बनाना। जापान, जर्मनी, ब्राजील भी दावेदार हैं। चारों मिलकर हर मंच पर मुद्दा उठाएंगे।
दूसरी: ग्लोबल साउथ को साथ लाना। अफ्रीका के 54 देश, ASEAN, लैटिन अमेरिका। भारत कह रहा है “हम सब मिलकर मांग करेंगे तो दुनिया सुनेगी।”
तीसरी: P5 से द्विपक्षीय बात। अमेरिका और फ्रांस पहले ही समर्थन दे चुके। रूस भी हां कह चुका। ब्रिटेन भी। अब सिर्फ चीन को मनाना बाकी है। V4 का समर्थन इसीलिए अहम है क्योंकि ये चीन को संदेश है कि यूरोप भी भारत के साथ है।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं
पूर्व राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने कहा “V4 का समर्थन छोटा नहीं है। ये दिखाता है कि भारत की छवि अब सिर्फ एक बड़े बाजार की नहीं, एक जिम्मेदार शक्ति की है।” सुरक्षा मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने कहा “वीटो पावर के बिना स्थायी सीट का कोई मतलब नहीं। भारत को वीटो की मांग पर अड़े रहना चाहिए।” जेएनयू के प्रोफेसर डॉ. राजीव रंजन ने कहा “ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर भारत ने नैतिक बढ़त ले ली है। अब पश्चिमी देश भी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।”
V4 देशों का समर्थन भारत की कूटनीतिक जीत है। 30 साल से भारत दरवाजा खटखटा रहा था। अब यूरोप के अंदर से आवाज आई है कि “दरवाजा खोलो।” संयुक्त राष्ट्र का सुधार आसान नहीं है। इसके लिए 2/3 देशों की हां और P5 में से किसी का वीटो नहीं चाहिए। लेकिन V4 जैसे मध्यम शक्तियों का साथ आने से मोमेंटम बनता है। भारत ने साबित किया है कि वो सिर्फ मांगने वाला नहीं, देने वाला देश है। वैक्सीन दी, शांति सैनिक दिए, डिजिटल टेक्नोलॉजी दी। अब दुनिया को तय करना है कि 21वीं सदी की सुरक्षा परिषद में भारत होगा या नहीं। स्लोवाकिया के विदेश मंत्री के शब्दों में कहें तो “भारत के बिना UNSC अधूरी है।” और शायद अब वो दिन दूर नहीं जब भारत उस हाई टेबल पर बैठकर दुनिया के फैसले लेगा।